बिहार में सियासी
सरगर्मियां उफान पर हैं..तकरीबन सभी सियासी पार्टियां.. आम अवाम से सीधा संवाद
करने की जुगत में लगीं है..हर किसी के पास अपने अपने मुद्दे है..जनसंवाद अब रैलीयों
का रूप अखित्यार करने जा रहा है...जदयू और भाजपा ने तो रैली के लिए तारीख का ऐलान
भी कर दिया है..वहीं लालू यादव की पार्टी आरजेडी मंथन में है....और बाकी दल अपने
को आंक रहे है..कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बिहार में राजनीतिक तौर पर रैलीयों
का मौसम आ रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता बिहार में कितनी
है...इसे जरा नापना मुश्किल है...साल 2005 के बाद साल 2010 में भी सुशासन की वजह
से नीतीश दोबारा सत्ता में आए...लेकिन इस मजे सियासी खिलाड़ी को इस बात का अहसास
है कि...किसी भी नारे का वजूद एक वक्त के बाद खत्म हो जाता है। जनता सुशासन को दु;शासन करार दे..इससे पहले जनता के मन में
दूसरी सोच डालने की गरज से नीतीश ने विशेष राज्य के मुद्दे को विकास के साथ जोड़
दिया, इसे लेकर वो अधिकार रैली करने जा रहें है।
बिहार में एनडीए की सरकार
है...बीजेपी सरकार की बी टीम मानी जाती है..लेकिन बी को भी इस बात का इल्म है कि
अगर वजूद को बचाए रखना है तो...जनता से संवाद होना चाहिए..लिहाजा इस पार्टी ने भी
बिहार में रैली का आयोजन किया है। लगातार दो चुनाव हारने के बाद बिहार की मुख्य
विपक्षी पार्टी हांफ रही है..लेकिन लालू प्रसाद यादव दिल्ली से उर्जा ले बिहार में
अपना जनाधार पाने के लिए बेताब दिख रहे है..यात्रा दर यात्रा का दौर जारी
है...कहते हैं कि मैं भी रैली करूंगा...लेकिन जरा रूक कर कांग्रेस एक लंबे अर्से
से जनता के बीच जाने की कोशिश में है...लेकिन कभी गुटबाजी ने मारा तो कभी अपनी
गलतियों ने...कई बार ऐसा हुआ कि चलना चाहा तो आलाकमान ने रोक दिया..पर अब जनता के
बीच फिर जाना चाह रही है पार्टी एक जमाना था जब बिहार
में कहा जाता था कि जिधर राम विलास उधर की सत्ता विलास..लेकिन ये मिथक अब टूट गया
है...रामविलास खिसकती जमीन को पाने के लिए जनता के बीच उतरना चाह रहे हैं...जिस
पार्टी का जैसा वजूद है..वो उसी रूप में जनता के बीच जाने की कवायद में है।
रैलियों के रेले के बीच लोकतंत्र की वो सच सामने दिख रहा है कि..जिसमे कहा जाता है
कि लोकतंत्र में जनता ही मालिक है..लिहाजा चुनाव की आहट पा सभी राजनीतिक दल मालिक
के पास अपने अपने हिसाब से जाने की सोच रहे हैं।



