
भोपाल के प्रियंका और उमर की शादी को लेकर काफी हो हल्ला मचा। मीडिया ने भी इसे खूब कवरेज दी। भोपाल की सड़कों पर लोगों ने जमकर प्रदर्शन भी किया। देख कर एक ही बात ज़ेहन में आयी “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दिवाना” मैने हालांकि कुछ दिनों पहले इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया लिखी थी, लेकिन इस उफनते उबाल को देखकर मेरा मन एक बार फिर मचल गया और वहां की लेटेस्ट जानकारियां पाने के लिए बेताब हो गया। इन्टरनेट पर बैठते ही गुगल पर जैसे ही भोपाल टाईप किया तो किसी नये भोपाली रचनाकार की एक रचना दिख गयी। उन लाईनों को पढ़ते ही समृद्ध भोपाल की एक छवि मेरे ज़ेहन में खिच गयी। लेकिन थोड़ी देर में ही एक पीड़ा मन में चुभने लगी कि क्या आज़ का भोपाल वही भोपाल है जिसे कवि ने अपनी रचना में दर्शाया है। वो रचना आपके सामने है.....
अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलामतेरी गलियो में बसा है जन्नत का धाम…..
बहारे अदब भी है मोसकी में भी है बांकपन
फिजा ए हुस्न भी है कि सजी दुल्हन सजी दुल्हन
अहले दिल सुनाते मुहब्बत का पैगाम
अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम ….
तेरे हुस्न पर फिदा दोड़े चले आते है
कई कश्मीर से कई मुम्बई से चले आते है।
तेरे घुंघरूओं से है गूंजती श्यामला की शाम
अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम त्…..
तेरे नक्श है सलोने तेरे तालों में हैं खनक
जुबा.ए.मुहब्बत के बोलों में है खनक
हर दिल अज़ीज करता है सलाम
यह शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम …
तेरी माटी से जुड़ा है शायरों का ज़हन
हर शाम रंगीन सजाने का है चलन
मन्दिर में भजन पढते है मस्जिद में कुरआन
अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम ….
मन्दिर में भजन पढते है मस्जिद में कुरआन, अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम। ये अंतिम पंक्ति धर्मनिरपेक्ष भोपाल की झांकी दिखाता है, लेकिन मज़हब के ठेकेदारों को कौन समझाये?