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Friday, October 19, 2007

बेनज़ीर भुट्टो के काफ़िले पर हमला



पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के स्वदेश लौटने के बाद कराची में उनके काफ़िले में दो बम धमाके हुए हैं जिनमें 125 लोग मारे गए हैं और लगभग 300 लोग घायल हुए हैं.धमाके स्थानीय समयानुसार मध्यरात्रि के बाद हुए जब आठ साल बाद पाकिस्तान लौटीं बेनज़ीर भुट्टो हज़ारों समर्थकों के काफ़िला के साथ कराची की सड़कों से होती हुई मोहम्मद अली जिन्ना की मज़ार की ओर जा रही थीं. ग़ौरतलब है कि ये हमले व्यापक सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद हुए. कुछ चरमपंथी गुटों ने बेनज़ीर भुट्टो के पाकिस्तान लौटने से पहले धमकियाँ जारी की थीं. अज़हर फ़ारुक़ी का कहना था दो धमाकों में से एक आत्मघाती हमला था. मृतकों में अनेक पुलिसकर्मी, एक स्थानीय टेलीविज़न चैनल के कैमरामैन और बेनज़ीर की पार्टी के कई कार्यकर्ता हैं. पाकिस्तान के गृहमंत्री के आफ़ताब शेरपाओ ने बीबीसी को बताया कि बेनज़ीर भुट्टो और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के दूसरे बड़े नेता सुरक्षित हैं.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि ये धमाके मध्यरात्रि के बाद हुआ. पहले एक धमाका हुआ जिसके बाद अफ़रातफ़री फैल गई लेकिन इससे पहले कि सुरक्षाकर्मी और मौजूद नेता स्थिति को संभाल पाते, दूसरा भीषण धमाका हुआ. दूसरा धमाका पहले की तुलना में ज़्यादा ज़बरदस्त था और ज़्यादा लोगों की जान दूसरे धमाके के कारण गई. धमाकों के कारण बेनज़ीर भुट्टो के वाहन की खिड़कियों के शीशे टूट गए.जब काफ़िला चला था तब बेनज़ीर ट्रक के ऊपर, अन्य नेताओं के साथ खड़ी, हाथ हिलाती नज़र आ रही थीं. लेकिन जब विस्फोट हुए तब बेनज़ीर भुट्टो वाहन के भीतर जा चुकी थीं और अंदर बैठी हुई थीं. बेनज़ीर भुट्टो को उनके निवास बिलावल हाउस पहुँचा दिया गया. उनकी ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया है. हमलों के बाद उनके घर की सुरक्षा और कड़ी कर दी गई है. हालांकि अधिकारियों के अनुसार बेनज़ीर भुट्टो को सुरक्षा कारणों के चलते सड़क की जगह हैलीकॉप्टर से यात्रा करने को कहा गया था पर उन्होंने रैली के साथ सड़क से जाना ही तय किया.धमाकों के बाद पूरे कराची को 'सील' कर दिया गया है, 'हाई अलर्ट' घोषित कर दिया गया और सभी संभावित कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं.कराची के पुलिस प्रमुख अज़हर फ़ारुक़ी से यह पूछने पर कि सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम के बावजूद हमला कैसे हुआ, उनका कहना था कि जब इतनी भीड़ हो तो आत्मघाती हमला हो सकता है.उनका कहना था, "सुरक्षा के लिए इंतज़ाम तो किए जा सकते हैं पर आत्मघाती हमलावरों को रोक पाना पूरी तरह से संभव नहीं होता है. हज़ारों-लाखों लोग हों तो यह तय करना मुश्किल होता है कि कौन लोग काफ़िले में शामिल लोग हैं और कौन नहीं."उन्होंने कहा, "जब काफ़िला 14-16 किलोमीटर चल चुका हो तो जैमर की बैटरी भी काम करना बंद कर देती है और यदि हमला रिमोट से न किया गया हो तो उसे जैमर से रोकना संभव ही नहीं होता."जहाँ गुरुवार को धमाकों के पहले तक कराची में जश्न का माहौल बना हुआ था वहीं अब मातम और शोक की छाया है. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि घटनास्थल पर चारों तरफ़ लाशें बिखरी पड़ी थीं और जहाँ-तहाँ ख़ून बिखरा हुआ था. घायलों को कई अस्पतालों में पहुँचाया गया. इनमें से अनेक लोगों की हालत नाज़ुक बताई जा रही है. उल्लेखनीय है कि बेनज़ीर भुट्टो दोपहर को दुबई से पाकिस्तान पहुँचीं और उनके स्वागत की रैली एयरपोर्ट से शहर की ओर निकली थी. इस रैली में बेनज़ीर भुट्टो के दसियों हज़ार समर्थक थे. धमाकों के बाद काफ़िले को रोक दिया गया और आसपास के इलाक़े की घेरेबंदी कर दी गई. वहाँ बम निरोधक दस्ते भी भेजे गए. तालेबान समर्थक चरमपंथियों ने पहले ही हमलों की धमकी दी थी और इसके मद्देनज़र कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी. प्रशासन ने 'फ़ूलप्रूफ़' सुरक्षा व्यवस्था का दावा किया था.
बेनज़ीर भुट्टो के काफ़िले पर हमला
पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के स्वदेश लौटने के बाद कराची में उनके काफ़िले में दो बम धमाके हुए हैं जिनमें 125 लोग मारे गए हैं और लगभग 300 लोग घायल हुए हैं.धमाके स्थानीय समयानुसार मध्यरात्रि के बाद हुए जब आठ साल बाद पाकिस्तान लौटीं बेनज़ीर भुट्टो हज़ारों समर्थकों के काफ़िला के साथ कराची की सड़कों से होती हुई मोहम्मद अली जिन्ना की मज़ार की ओर जा रही थीं. ग़ौरतलब है कि ये हमले व्यापक सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद हुए. कुछ चरमपंथी गुटों ने बेनज़ीर भुट्टो के पाकिस्तान लौटने से पहले धमकियाँ जारी की थीं. अज़हर फ़ारुक़ी का कहना था दो धमाकों में से एक आत्मघाती हमला था. मृतकों में अनेक पुलिसकर्मी, एक स्थानीय टेलीविज़न चैनल के कैमरामैन और बेनज़ीर की पार्टी के कई कार्यकर्ता हैं. पाकिस्तान के गृहमंत्री के आफ़ताब शेरपाओ ने बीबीसी को बताया कि बेनज़ीर भुट्टो और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के दूसरे बड़े नेता सुरक्षित हैं.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि ये धमाके मध्यरात्रि के बाद हुआ. पहले एक धमाका हुआ जिसके बाद अफ़रातफ़री फैल गई लेकिन इससे पहले कि सुरक्षाकर्मी और मौजूद नेता स्थिति को संभाल पाते, दूसरा भीषण धमाका हुआ. दूसरा धमाका पहले की तुलना में ज़्यादा ज़बरदस्त था और ज़्यादा लोगों की जान दूसरे धमाके के कारण गई. धमाकों के कारण बेनज़ीर भुट्टो के वाहन की खिड़कियों के शीशे टूट गए.जब काफ़िला चला था तब बेनज़ीर ट्रक के ऊपर, अन्य नेताओं के साथ खड़ी, हाथ हिलाती नज़र आ रही थीं. लेकिन जब विस्फोट हुए तब बेनज़ीर भुट्टो वाहन के भीतर जा चुकी थीं और अंदर बैठी हुई थीं. बेनज़ीर भुट्टो को उनके निवास बिलावल हाउस पहुँचा दिया गया. उनकी ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया है. हमलों के बाद उनके घर की सुरक्षा और कड़ी कर दी गई है. हालांकि अधिकारियों के अनुसार बेनज़ीर भुट्टो को सुरक्षा कारणों के चलते सड़क की जगह हैलीकॉप्टर से यात्रा करने को कहा गया था पर उन्होंने रैली के साथ सड़क से जाना ही तय किया.धमाकों के बाद पूरे कराची को 'सील' कर दिया गया है, 'हाई अलर्ट' घोषित कर दिया गया और सभी संभावित कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं.कराची के पुलिस प्रमुख अज़हर फ़ारुक़ी से यह पूछने पर कि सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम के बावजूद हमला कैसे हुआ, उनका कहना था कि जब इतनी भीड़ हो तो आत्मघाती हमला हो सकता है.उनका कहना था, "सुरक्षा के लिए इंतज़ाम तो किए जा सकते हैं पर आत्मघाती हमलावरों को रोक पाना पूरी तरह से संभव नहीं होता है. हज़ारों-लाखों लोग हों तो यह तय करना मुश्किल होता है कि कौन लोग काफ़िले में शामिल लोग हैं और कौन नहीं."उन्होंने कहा, "जब काफ़िला 14-16 किलोमीटर चल चुका हो तो जैमर की बैटरी भी काम करना बंद कर देती है और यदि हमला रिमोट से न किया गया हो तो उसे जैमर से रोकना संभव ही नहीं होता."जहाँ गुरुवार को धमाकों के पहले तक कराची में जश्न का माहौल बना हुआ था वहीं अब मातम और शोक की छाया है. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि घटनास्थल पर चारों तरफ़ लाशें बिखरी पड़ी थीं और जहाँ-तहाँ ख़ून बिखरा हुआ था. घायलों को कई अस्पतालों में पहुँचाया गया. इनमें से अनेक लोगों की हालत नाज़ुक बताई जा रही है. उल्लेखनीय है कि बेनज़ीर भुट्टो दोपहर को दुबई से पाकिस्तान पहुँचीं और उनके स्वागत की रैली एयरपोर्ट से शहर की ओर निकली थी. इस रैली में बेनज़ीर भुट्टो के दसियों हज़ार समर्थक थे. धमाकों के बाद काफ़िले को रोक दिया गया और आसपास के इलाक़े की घेरेबंदी कर दी गई. वहाँ बम निरोधक दस्ते भी भेजे गए. तालेबान समर्थक चरमपंथियों ने पहले ही हमलों की धमकी दी थी और इसके मद्देनज़र कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी. प्रशासन ने 'फ़ूलप्रूफ़' सुरक्षा व्यवस्था का दावा किया था.

Saturday, July 14, 2007

दुर्लभ हुआ न्याय

किसी औरत के लिए न्याय पाने की उम्मीद करना भी इस निष्ठुर समाज में कितना मुश्किल है, यह राष्ट्रीय महिला आयोग के सामने हुई घटना से पता चलता है। नीला नाम की वह स्त्री जो पांच मुस्तंडों के खिलाफ न्याय के लिए भटक रही थी, ठीक आयोग के उस दरवाजे के सामने मारी-पीटी और बेइज्जत की जाती है। लामपुर की नीला यहां उस मामले की सुनवाई के लिए आई थी, जिसमें ये पांचों आरोपी हैं। नीला ने बताया कि पहले तो उन्होंने उसको धमकाया, पर जब वह डरी नहीं तो वे अभद्रता में उतर आए। पुलिस की उदासीनता से थक कर नीला आयोग तक पहुंची थी। यह खौफनाक घटना ठीक उसी वक्त होती है, जब महिला मामलों की मंत्री रेणुका चौधरी रेल मंत्रालय के उस उच्च अधिकारी के खिलाफ मीडिया में चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थीं कि उसको छोड़ा नहीं जाएगा, जिसने दो दिन पहले एक औरत के साथ ट्रेन में छेड़छाड़ की थी और जिसको बचाने के लिए रेलमंत्री लालू यादव हरी झंडी दे चुके थे। उम्मीद तो यही है कि रेणुका मामले को जानने के बाद ही कड़े कदम उठाएंगी। केंद्रीय महिला आयोग की तो यह हालत है ही, उधर रेणुका के गृह प्रदेश आंध्र के महिला आयोग की अध्यक्ष ही बेबसी के साथ रोती घूम रही है। उसकी कोई सुन नहीं रहा और वह न्याय के लिए सड़क पर उतर आई है। औरतों के लिए न्याय पाना यूं भी अपने यहां बहुत मुश्किल है, तमाम बातें बनाने के बाद भी सरकार कोई ऐसे पुख्ता कदम उठाने में एकदम असफल है, जो स्त्री सशक्तीकरण में जानदार भूमिका निभा सकें। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सभी सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में औरतों के उत्पीड़न के खिलाफ सुनवाई करने वाली कमेटी का होना आवश्यक है पर जहां नीला का शोषण हुआ वह वन विभाग के अंतर्गत आता है।

हालांकि आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास बेहद संवेदनशील और जागरूक महिला हैं पर सरकारी ढुलमुलता के असर से तो वह समूची व्यवस्था को बचा नहीं सकती। जैसा कि नीला के मामले में भी हुआ कि पुलिस इस मार-पिटाई की रपट लिखने को ही राजी नहीं हुई। काफी हंगामे और एक अन्य औरत के उच्च अधिकारियों से बात किए जाने की धमकी के बाद ही पुलिस के कानों में जूं रेंगी। जब भी बात औरतों के खिलाफ छेड़छाड़ की आती है सबसे बड़ी यही बात उठती है कि वे अपना दुखड़ा रोने कहां जाएं। अभी दो-चार रोज पहले ही किसी टीवी चैनल पर सड़कों पर लड़कियों को छेड़ने वाले मनचलों को पकड़ती पुलिस दिख रही थी, जो इनसे हाथ जोड़ कर माफी मंगवा रही थी। जिस समय इनके घर वालों और रिश्तेदारों ने इनको देख कर सवाल किया होगा, तो निश्चित रूप से इन्होंने खुद को निर्दोष बताते हुए, नई कहानी सुनाई होगी। जब तक समूचे समाज में औरतों के प्रति सम्मानजनक रवैया नहीं बन जाता, तब तक मनचलों की हरकतों की वे ऐसे ही शिकार होती रहेंगी। आला पुलिस अधिकारी किरन बेदी हमेशा कहती हैं कि औरतों को अपनी हिफाजत के लिए खुद भी मुस्तैद रहना सीखना होगा। परंतु औरतों को यह भी समझना होगा कि सशक्तीकरण की यह भूख जितनी बढ़ेगी, पुरूष खुद को उतना ही लाचार महसूसेंगे और हताशा में उनसे इसी तरह के नकारात्मक बर्ताव अनचाहे भी हो जाएंगे जिनसे लड़ते हुए ही अपनी जगह बनाएगी औरत।

Sunday, April 15, 2007

शर्म करो मंदिरा !

शर्म करो मंदिरा !
माना कि आप एक माडल पृष्ठभूमि से सम्बन्ध रखती है और आपका मूल पेशा भी वही है लेकिन किसी की धार्मिक भावनाओं से खेलना आप को शोभा नही देता। ख़ासकर उस आदमी से जो ख़ुद पंजाब की ज़मी से ताल्लुक रखता हो। आपकी तस्वीर देखने से पहले मै सिख कट्टरपंथियों को कोस रहा था, लेकिन आपकी इस तस्वीर को देख कर मुझे अपने आप पे खीज आ गयी। इसके दो कारण है एक तो नाहक ही बिना सच जाने प्रतिक्रिया देने चला था और दुसरा कि अब लोगों को ये बताते हुए भी शर्म आएगी कि मै आपका फैन था।
अब तो ज्यादा कुछ कहने की जरुरत ही नही है क्योंकि आपकी तस्वीर ही सब कुछ खुद ब खुद बयां कर रही है।

"जेलों में जंग"


दिल्ली और उत्तरप्रदेश की जेलों की हालत पर क्या कहा जाए, आए दिन कुछ ना कुछ घटनाएं सुनने को मिल ही जाती हैं। गाजियाबाद के डासना जिला कारागार में शनिवार को कैदीयों ने घंटों जमकर उत्पात मचाया। स्थिति पर काबू करने के लिए पुलिस व जेल स्टाफ को कई राउंड गोलियां चलानी पड़ी और आंसू गैस के गोले भी दागने पड़े। इसमें एक दर्जन पुलिसवाले व जेलकर्मी तथा करीब अस्सी बंदी घायल भी हुए। जिलाधिकारी व पीएसी के पहुंचने के बाद ही जेल में पुलिस बल प्रवेश कर सका। अभी कुछ ही दिनों पहले मेरठ जेल का निरीक्षण करने पहुंचे डीआईजी (जेल) एमएल प्रकाश की टीम को कैदियों ने जमकर धुना था। इस मामले में जेल प्रशासन की मिलीभगत होने की आशंका जतायी गयी थी। जेल की छापामारी में मोबाइल फोन व अन्य आपत्तिजनक वस्तुएं मिली थी। इस मामले की जांच एसडीएम को सौंपी गयी । दरअसल कुछ दिनों पूर्व भी वरिष्ठ अफसरों ने शिकायतें मिलने पर मेरठ जेल में छापामारी की थी। उस समय भी छापामारी के दौरान जेल में मोबाइल फोन और सिम कार्ड मिले थे। अभी कुछ ही दिन पूर्व तिहाड़ जेल के 12 विचाराधीन कैदी उस समय फरार हो गए, जब उन्हें एक विशेष अदालत में पेश करने के लिए ले जाया जा रहा था। जेलों में इस तरह बढ़ रही घटनाओं को देखकर क्या ये नही लगता कि अब वो समय आ गया है कि इस पर कोई ठोस कदम उठाया जाए? जिससे इस तरह की घटनाओं पर नकेल कसी जा सके।

"उमा की उलझन"






उमा भारती ने उत्तर प्रदेश चुनावों के बीच जिस तरह अचानक अपने प्रत्याशियों को वापस लेने की घोषणा से यह समझना कठिन हो गया है कि उनकी राजनीति किस तरह की राजनीति कर रहीं है? भाजपा से अलग होकर भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन करने वाली उमा भारती ने उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा के पक्ष में अपने प्रत्याशी हटाने की घोषणा करने के साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वह फिर से अपने मूल दल में शामिल नहीं होंगी, लेकिन उन्होंने अपने इस निर्णय के पीछे संघ परिवार के दबाव और अनुरोध का उल्लेख जरूर किया। ऐसा लगता है कि उमा भारती भाजपा से अलग होने के बाद यह तय नहीं कर पा रही है कि उन्हे अपनी राजनीति को किस तरह आगे बढ़ाना है? यही कारण है कि उनके भाजपा में लौटने की खबरे रह-रहकर आती ही रहती है। हालांकि ऐसी खबरों का वह खंडन करती रही है, लेकिन भाजपा के अनेक नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण देने का कोई मौका नहीं छोड़तीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हे इस बात का अहसास हो गया है कि वह अपने बलबूते एक सक्षम राजनीतिक शक्ति के रूप में नहीं उभर सकतीं? उत्तर प्रदेश चुनाव में अपने प्रत्याशी हटाने की उमा भारती ने जो घोषणा की उससे उनके समर्थकों का भ्रमित होना स्वाभाविक ही है। जब इस फैसले के बाद मदनलाल खुराना जैसे नेता उनसे दूर हो रहे है तब यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि अन्य समर्थक उनके साथ बने रहेगे? यदि उमा भारती इसी तरह एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाली राजनीति करती रहेगी तो इससे उनकी विश्वसनीयता को ही क्षति पहुंचेगी। उमा भारती के अनुसार उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में हिंदुत्व आधारित ताकतों को एकजुट करने के लिए अपने प्रत्याशी हटाए। यदि उनके इस निर्णय के पीछे वास्तव में यही कारण है तो फिर वह भविष्य में होने वाले चुनावों में किस आधार पर अपने प्रत्याशी उतार सकेंगी? आखिर ऐसा तो है नहीं कि चुनावों में हिंदू मतों के विभाजित होने का खतरा वह अकेले उत्तर प्रदेश में महसूस कर रही हों। जो भी हो, उमा भारती के इस निर्णय से उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों पर शायद ही कोई असर पड़े। उमा जी अब तो अपना लाईन लेन्थ ठीक कर लिजिए।

Saturday, April 14, 2007

“बेगानी शादी में अब्दुल्ला दिवाना”



भोपाल के प्रियंका और उमर की शादी को लेकर काफी हो हल्ला मचा। मीडिया ने भी इसे खूब कवरेज दी। भोपाल की सड़कों पर लोगों ने जमकर प्रदर्शन भी किया। देख कर एक ही बात ज़ेहन में आयी “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दिवाना” मैने हालांकि कुछ दिनों पहले इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया लिखी थी, लेकिन इस उफनते उबाल को देखकर मेरा मन एक बार फिर मचल गया और वहां की लेटेस्ट जानकारियां पाने के लिए बेताब हो गया। इन्टरनेट पर बैठते ही गुगल पर जैसे ही भोपाल टाईप किया तो किसी नये भोपाली रचनाकार की एक रचना दिख गयी। उन लाईनों को पढ़ते ही समृद्ध भोपाल की एक छवि मेरे ज़ेहन में खिच गयी। लेकिन थोड़ी देर में ही एक पीड़ा मन में चुभने लगी कि क्या आज़ का भोपाल वही भोपाल है जिसे कवि ने अपनी रचना में दर्शाया है। वो रचना आपके सामने है.....

अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम
तेरी गलियो में बसा है जन्नत का धाम…..
बहारे अदब भी है मोसकी में भी है बांकपन
फिजा ए हुस्न भी है कि सजी दुल्हन सजी दुल्हन
अहले दिल सुनाते मुहब्बत का पैगाम
अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम ….
तेरे हुस्न पर फिदा दोड़े चले आते है
कई कश्मीर से कई मुम्बई से चले आते है।
तेरे घुंघरूओं से है गूंजती श्यामला की शाम
अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम त्…..
तेरे नक्श है सलोने तेरे तालों में हैं खनक
जुबा.ए.मुहब्बत के बोलों में है खनक
हर दिल अज़ीज करता है सलाम
यह शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम …
तेरी माटी से जुड़ा है शायरों का ज़हन
हर शाम रंगीन सजाने का है चलन
मन्दिर में भजन पढते है मस्जिद में कुरआन
अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम ….

मन्दिर में भजन पढते है मस्जिद में कुरआन, अय शहरे भोपाल तुझे मेरा सलाम। ये अंतिम पंक्ति धर्मनिरपेक्ष भोपाल की झांकी दिखाता है, लेकिन मज़हब के ठेकेदारों को कौन समझाये?

Friday, April 13, 2007

ब्रितानी बच्चों की किताबों में "जलियांवाला बाग"



सुन कर अच्छा लगा कि ब्रिटेन के स्कूलों में ब्रिटिश राज के इतिहास के अध्ययन के तहत 1919 में एक ब्रिटिश जनरल द्वारा अमृतसर के जलियांवाला बाग में सैकड़ों भारतीयों का कत्लेआम किये जाने की घटना के बारे में पढ़ाया जाएगा। ब्रिटिश अखबार, द टाइम्स ने यह खबर दी है कि द क्वालिफिकेशन्स एंड करिकुलम अथॉरिटी ने कहा है कि 11 से 14-वर्षीय छात्रों को ब्रिटेन और भारत के साझा इतिहास की जानकारी देने के लिए यह पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। यह पाठ्यक्रम 15 घंटों की अवधि में पूरा किया जाएगा और इससे छात्रों को कत्लेआम की विभिन्न व्याख्याओं का आकलन करने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि भारत पर अंग्रेजों के शासन के दौरान ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में सभा कर रहे निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाने का हुक्म अपने सैनिकों को दिया था, जो ब्रिटिश राज पर सबसे बदनुमा दाग है। इस कत्लेआम के बाद पूरे भारत में राष्ट्रवादी भावनाएं भड़क उठी थीं और ब्रिटिश राज से पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने की मांग बढ़ने लगी थी।

अब तक शहीदों की सही संख्या की जानकारी भी नही है लोगों को
इस घटना के 87 साल बीत जाने के बाद भी आज तक शहीदों हुए लोगों के सही संख्या के बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी नही। इन शहीदों को अभी तक स्वतंत्रता सेनानी का भी दर्जा नही मिल पाया है। हंटर कमेटी की रिपोर्ट में मरने वालों की सख्या 200 से 300 के करीब बतयी गयी थी, जबकि पंजाब होम मिनिस्ट्री की रिपोर्टमें मरने वालों की संख्या 379 और घायलों की संख्या 1200 बतायी गयी थी। भारत सरकार कई इतिहासकारों के हस्तक्षेप के बावजूद अंग्रेजी आंकड़ों की ही मुरीद बनी है अब तक। सवाल ये है कि ब्रिटिश सरकार क्या अपने पाठ्यक्रमों में भी इन आंकड़ों का घाल-मेल करेगी?

Thursday, April 12, 2007

ये मोहब्बत नही, नीजी स्वतंत्रता की जीत है...


भोपाल में एक हिंदू लड़की प्रियंका और मुसलिम लड़के उमर के बीच विवाह के बाद जो हंगामा हुआ उस पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बहुत ही अच्छा निर्णय लिया। कट्टरपंथियों द्वारा खड़े किये इस विवाद का मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी की तर्ज पर पटाक्षेप हो गया। कोर्ट ने भोपाल पुलिस को नवविवाहित दंपत्तिऔर उनके परिवारजनों को समुचित सुरक्षा मुहैया कराने के लिए कहा है। उधर इस विवाह के विरोध में धर्म के ठेकेदारों ने बुधवार को भोपाल में चार-पांच स्थानों पर धरना प्रदर्शन किया। इस संबंध में लड़की के परिवारजनों ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई है। भोपाल के कोहेफिजा थाना अंतर्गत एक बिल्डर की पुत्री प्रियंका ने एक मुसलिम युवक उमर के साथ घर से भाग कर शादी कर ली। इसके बाद लड़की के परिवारजनों की ओर से पुलिस में गत दो अप्रैल को रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसके बाद युवक के परिवारजनों से पूछताछ के नाम पर पुलिस पुलिस द्वारा उन्हें प्रताड़ित करने की बात खुलकर सामने आयी। हालांकि पुलिस ने इससे इनकार किया है। उधर प्रियंका और उमर बुधवार को मुंबई में मीडिया से मुखातिब हुये और उन्होंने प्रेम विवाह की बात स्वीकारते हुए कहा कि दोनों बालिग हैं और उन्होंने राजीखुशी यह फैसला किया। इसमें किसी का कोई दबाव या हस्तक्षेप नहीं है। अब उन धर्म के ठेकेदारों को चेत जाना चाहिए कि किसी के नीजी जीवन में हस्तक्षेप का किसी को आधिकार नही है।

ये मोहब्बत की जीत नही है.......



भोपाल में एक हिंदू लड़की प्रियंका और मुसलिम लड़के उमर के बीच विवाह के बाद जो हंगामा हुआ उस पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बहुत ही अच्छा निर्णय लिया। कट्टरपंथियों द्वारा खड़े किये इस विवाद का मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी की तर्ज पर पटाक्षेप हो गया। कोर्ट ने भोपाल पुलिस को नवविवाहित दंपत्तिऔर उनके परिवारजनों को समुचित सुरक्षा मुहैया कराने के लिए कहा है। उधर इस विवाह के विरोध में धर्म के ठेकेदारों ने बुधवार को भोपाल में चार-पांच स्थानों पर धरना प्रदर्शन किया। इस संबंध में लड़की के परिवारजनों ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज कराई है। भोपाल के कोहेफिजा थाना अंतर्गत एक बिल्डर की पुत्री प्रियंका ने एक मुसलिम युवक उमर के साथ घर से भाग कर शादी कर ली। इसके बाद लड़की के परिवारजनों की ओर से पुलिस में गत दो अप्रैल को रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसके बाद युवक के परिवारजनों से पूछताछ के नाम पर पुलिस पुलिस द्वारा उन्हें प्रताड़ित करने की बात खुलकर सामने आयी। हालांकि पुलिस ने इससे इनकार किया है। उधर प्रियंका और उमर बुधवार को मुंबई में मीडिया से मुखातिब हुये और उन्होंने प्रेम विवाह की बात स्वीकारते हुए कहा कि दोनों बालिग हैं और उन्होंने राजीखुशी यह फैसला किया। इसमें किसी का कोई दबाव या हस्तक्षेप नहीं है। अब उन धर्म के ठेकेदारों को चेत जाना चाहिए कि किसी के नीजी जीवन में हस्तक्षेप का किसी को आधिकार नही है।

Wednesday, April 11, 2007

कठमुल्लों का पाकिस्तान




विश्व समुदाय के सामने भले ही पाकिस्तान कुछ भी कहे लेकिन आज भी वहां का समाज और निज़ाम दोनों कठमुल्लों के आगे बेबस हैं। अभी हाल ही में पाकिस्तान के एक विवादित इस्लामी अदालत यानी शरिया अदालत ने देश की पर्यटन मंत्री नीलोफ़र बख़्तियार के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया है। अदालत ने अख़बार में छपी एक तस्वीर पर आपत्ति जताई है और कहा है कि उन्होंने अश्लील तरीके से तस्वीर खिंचवाई है। दरअसल नीलोफ़र बख़्तियार पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के भूकंप प्रभावितों के लिए धनराशि जुटाने के लिए फ़्रांस गई थीं और पैराग्लाइडिंग कर रही थीं। पाकिस्तानी अख़बारों में उनकी एक तस्वीर छपी है जिसमें वे कथित रुप से एक पुरुष को गले लगा रही हैं। इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के मौलवी अब्दुल अज़ीज़ ने ये बेहुदा माँग की है कि नीलोफ़र बख़्तियार को उनके पद से हटा दिया जाए। अब्दुल अज़ीज़ के हिसाब से नीलोफ़र बख़्यितार ने जो किया वो ग़ैर-इस्लामी था, उन्होंने इस्लाम के नाम को ख़राब किया है और सज़ा मिलनी चाहिए। गौरतलब है कि मौलवी अब्दुल अज़ीज़ की अगुआई में ही कई मौलवियों ने पिछले हफ़्ते तालेबान की तर्ज पर इस्लामिक कोर्ट शुरु करने की घोषणा की थी। इन लोगों ने घोषणा की थी कि अगर उनके समर्थकों के ख़िलाफ़ क़दम उठाए थे तो वो आत्मघाती हमले करेंगे। फ़रवरी में पाकिस्तानी पंजाब की समाज कल्याण मंत्री ज़िल्ले हुमा की एक बंदूकधारी ने गोली मार कर हत्या कर दी थी। पुलिस के मुताबिक, जाँच के दौरान हमलावर ने कहा था कि उच्च पदों पर महिलाओं का आना ख़ुदा के नियमों के ख़िलाफ़ है और पुरुषों को नीचा दिखाने का एक प्रयास है। ज़िल्ले हुमा सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग की एक सक्रिय सदस्या थीं और उनकी हत्या उस समय की गई जब वह एक राजनीतिक सभा को संबोधित करने जा रही थीं। पाकिस्तान का तलीबानी रुप सतही तौर पर भले ही भले ही न दिखे लेकिन अन्दर से पूरा पाकिस्तानी समाज़ और प्रशासन तलीबानी जंज़ीरों से जकड़ा हुआ है।

Monday, April 9, 2007

"मीडिया का “बेगार”




पत्रकारिता में भी बेगार होता है। चौकिये नहीं अगर आप मीडियाकर्मी है और किसी न्यूज चैनल या अख़बार में काम करतें हैं, तो वो आपको अच्छी तरह से मालूम होगा। अगर नहीं जानते हैं, तो आपका मीडिया में होना बेकार है। यही नहीं, बहुत संभावना है कि आपने भी शुरुआती दिनों में ये बेगारी की हो। मीडिया जगत में बेगार करनेवाले इन्टर्न के नाम से जाना जाता है। इस प्राणी की स्थिति अत्यन्त ही दयनीय होती है। ये सीखने की ललक और नौकरी की चाह के चक्कर में हाड़ -तोड़ मेहनत करते है, कुछ इन्टर्न तो ऐसे होते है कि मेहनत और प्रतिभा में अच्छे-अच्छों को मात देदें लेकिन वो होते तो हैं इन्टर्न ही, जो संस्थान द्वारा अपने कर्मचारियों को वर्क लोड़ कम करने के लिए उपलब्ध कराये जाते हैं। कुछ संस्थाएं तो ऐसी हैं जो 70 फीसदी इन्ही इन्टर्नस के बूते चलती हैं, अगर आप को यकीन नही हो रहा है तो जरुर आप देश के टाँप 4 चैनलों में से किसी में काम करते है। क्योंकि अभी इस जगहों पर ऐसी नौबत नही आयी है।

अभी कुछ दिनों पहले ही मेरे एक जूनियर का फोन आया, बातो से वो काफी निराश और हताश लग रहा था। मैने उसे कुरेदा तो उसका दर्द छलककर पीपल के दूध की तरह रिसने लगा। उसने उदास आवाज़ में ज़वाब दिया सर इन्टर्न करते करते मुझे एक साल हो गये है लेकिन यहां नौकरी का कोई चांस नजर नही आ रहा है। मैने इस लालच में यहां हाड़ तोड़ मेहनत की कि मुझे यहां नौकरी मिल जायेगी। मेरे साथ वालों को तो छोड़िये, मुझसे 6 महिने बाद वालों तक को नौकरी मिल गयी। जरा राहुल सर से मेरे लिए एक बार बात करिये ना। मुझे याद है एक साल पहले यही आभिषेक अपना फाइनल पेपर देने के बाद मुझसे मिलने डी.डी.न्यूज आया था। मै उसे अन्दर नही बुला सकता था, उस वक्त मेरी औकात किसी विजिटर को एंट्री दिलाने की नही थी लिहाजा मै ख़ुद बाहर गेट पर मिलने गया। उसने मुझसे इन्टर्नशीप का अनुरोध किया था, मैने वही से अपने मित्र राहुल को फोन लगाया, जो की एक नेशनल चैनल में बड़े ही जुगाड़ के बाद घुसा था और डेस्क बाबाओ की चौकड़ी में शामिल हो गया था। राहुल ने अभिषेक को दस दिन दौड़ाया और फिर तरस खा कर अपने यहां इन्टर्न रखवा लिया। उसके बाद अभिषेक का फोन बीच बीच में आता रहा इन्टर्नशीप बढ़वाने के लिए, हर बार मैने राहुल फैक्टर का ही इस्तेमाल किया। लेकिन अबकी अभिषेक की मदद में मै लाचार था,क्योंकि मै अपनी और राहुल की हैसियत से अच्छी तरह वाकिफ़ हूं। फिर भी मैने उसकी तसल्ली के लिए राहुल को फोन किया। राहुल का एक ही जवाब था दोस्त, लड़का मेहनत तो करता है लेकिन यहां साले लड़कियों और पौवे वालों को ही नौकरी देते है, तुमको तो सब कुछ पता ही है, तुम ही बताओ मै क्या करुं ? इतना ही होता तो मै तुम्हे यहां ना बुला लेता। मै झेपते हुए धीमी आवाज में ठीक है कह कर फोन रख दिया।


आज का मीडिया जहां समाजिक चेतना के नाम पर लोगों के घरों में घुस कर पारिवारिक विवादों को सड़कों पर घसीटने से भी परहेज नही कर रहा, वही इनकी संस्थाओं में घोर शोषण और भ्रष्टाचार व्याप्त है। मीडियाकर्मी मेरी बात ज्यादा अच्छी तरह सामझ सकते हैं क्योंकि वे इस माहौल से भली भांति परिचित होंगे। मैने लिखा भी इसी उद्देश्य से है कि इस विसंगति पर मीडिया तुर्कों की नज़र जाये। मैने सिर्फ सुना है देखा नही है कि एक जमाना था जब पेड इन्टर्न रखे जाते थे लेकिन आज आलम ये है कि दूरदर्शन जो खुद जनता के पैसे से चलाया जाता है वहां इन्टर्नशीप के लिए दो हजार रुपये लिए जा रहे हैं। हो सकता है कि वो दिन भी जल्द आ जाए कि निजी चैनल्स और अख़बार भी इस बात के पैसे वसूलने लगें। भविष्य में उनकी कमाई का ये अच्छा जरिया हो सकता है। कमाई के मद्देनज़र कुछ चैनल्स तो बकायदे अपना मीडिया स्कूल खोल रखा है, इससे उनकी अच्छी खासी उगाही भी हो रही है, जिससे वे अपने व्यवसायिक घाटे को पाट सकते है। अरस्तु ने एक बार कहा था कि राजनीति पूंजीपतियों की रखैल है। मै आज के मीडिया हाउस के मालिकों और पत्रकारों के सम्बन्ध की तुलना अरस्तु की उस उक्ति से करने की गुस्ताखी नही करुंगा। लेकिन अपने वरिष्ठो से इस पर चिंतन करने का अनुरोध जरुर करुंगा। हालांकि आज मीडिया में सभी, चाहें कितनी ही उँचीं पोस्ट पर ही क्यों न हो, अपनी ही समस्याओं से दिन रात जूझते रहते हैं । ऐसे में बेचारे दबे कुचले इन्टर्नो की फिक्र करने वाला है ही कौन?


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