किसी औरत के लिए न्याय पाने की उम्मीद करना भी इस निष्ठुर समाज में कितना मुश्किल है, यह राष्ट्रीय महिला आयोग के सामने हुई घटना से पता चलता है। नीला नाम की वह स्त्री जो पांच मुस्तंडों के खिलाफ न्याय के लिए भटक रही थी, ठीक आयोग के उस दरवाजे के सामने मारी-पीटी और बेइज्जत की जाती है। लामपुर की नीला यहां उस मामले की सुनवाई के लिए आई थी, जिसमें ये पांचों आरोपी हैं। नीला ने बताया कि पहले तो उन्होंने उसको धमकाया, पर जब वह डरी नहीं तो वे अभद्रता में उतर आए। पुलिस की उदासीनता से थक कर नीला आयोग तक पहुंची थी। यह खौफनाक घटना ठीक उसी वक्त होती है, जब महिला मामलों की मंत्री रेणुका चौधरी रेल मंत्रालय के उस उच्च अधिकारी के खिलाफ मीडिया में चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थीं कि उसको छोड़ा नहीं जाएगा, जिसने दो दिन पहले एक औरत के साथ ट्रेन में छेड़छाड़ की थी और जिसको बचाने के लिए रेलमंत्री लालू यादव हरी झंडी दे चुके थे। उम्मीद तो यही है कि रेणुका मामले को जानने के बाद ही कड़े कदम उठाएंगी। केंद्रीय महिला आयोग की तो यह हालत है ही, उधर रेणुका के गृह प्रदेश आंध्र के महिला आयोग की अध्यक्ष ही बेबसी के साथ रोती घूम रही है। उसकी कोई सुन नहीं रहा और वह न्याय के लिए सड़क पर उतर आई है। औरतों के लिए न्याय पाना यूं भी अपने यहां बहुत मुश्किल है, तमाम बातें बनाने के बाद भी सरकार कोई ऐसे पुख्ता कदम उठाने में एकदम असफल है, जो स्त्री सशक्तीकरण में जानदार भूमिका निभा सकें। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सभी सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में औरतों के उत्पीड़न के खिलाफ सुनवाई करने वाली कमेटी का होना आवश्यक है पर जहां नीला का शोषण हुआ वह वन विभाग के अंतर्गत आता है। 
हालांकि आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास बेहद संवेदनशील और जागरूक महिला हैं पर सरकारी ढुलमुलता के असर से तो वह समूची व्यवस्था को बचा नहीं सकती। जैसा कि नीला के मामले में भी हुआ कि पुलिस इस मार-पिटाई की रपट लिखने को ही राजी नहीं हुई। काफी हंगामे और एक अन्य औरत के उच्च अधिकारियों से बात किए जाने की धमकी के बाद ही पुलिस के कानों में जूं रेंगी। जब भी बात औरतों के खिलाफ छेड़छाड़ की आती है सबसे बड़ी यही बात उठती है कि वे अपना दुखड़ा रोने कहां जाएं। अभी दो-चार रोज पहले ही किसी टीवी चैनल पर सड़कों पर लड़कियों को छेड़ने वाले मनचलों को पकड़ती पुलिस दिख रही थी, जो इनसे हाथ जोड़ कर माफी मंगवा रही थी। जिस समय इनके घर वालों और रिश्तेदारों ने इनको देख कर सवाल किया होगा, तो निश्चित रूप से इन्होंने खुद को निर्दोष बताते हुए, नई कहानी सुनाई होगी। जब तक समूचे समाज में औरतों के प्रति सम्मानजनक रवैया नहीं बन जाता, तब तक मनचलों की हरकतों की वे ऐसे ही शिकार होती रहेंगी। आला पुलिस अधिकारी किरन बेदी हमेशा कहती हैं कि औरतों को अपनी हिफाजत के लिए खुद भी मुस्तैद रहना सीखना होगा। परंतु औरतों को यह भी समझना होगा कि सशक्तीकरण की यह भूख जितनी बढ़ेगी, पुरूष खुद को उतना ही लाचार महसूसेंगे और हताशा में उनसे इसी तरह के नकारात्मक बर्ताव अनचाहे भी हो जाएंगे जिनसे लड़ते हुए ही अपनी जगह बनाएगी औरत।
