चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के लिए तो चुनावों की घोषणा कर दी लेकिन जम्मू-कश्मीर पर अभी हालात की समीक्षा करते रहने भर का हवाला देकर पल्ला झाड़ दिया। लेकिन आयोग की इस हीला हवाली से आयोग के भीतर चल रही अंदरुनी सियासत का आंदाजा साफ तौर पर लगाया जा सकता है। माना जा रहा है कि इसकी एक वजह मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी की अन्य दो आयुक्तों के साथ राय मेल न खा पाना भी है। मालूम हो कि जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन 10 जनवरी तक है। अगर चुनाव आगे टालने हैं तो केंद्र सरकार को राज्यपाल शासन छह महीने और बढ़ाना होगा और संसद से मंजूरी लेनी पड़ेगी। भाजपा और वामदल पहले ही समय पर चुनाव मांग रहे हैं और सरकार दोबारा इस मुद्दे पर संसद में 'टेस्ट' नहीं देना चाहेगी। ठंड की वजह से वहां चुनाव या तो नवंबर-दिसंबर में करा लिए जाएं नहीं तो मार्च तक इंतजार करना पड़ सकता है।
दरअसल जम्मू के मसले पर कोई आम राय और निर्णय ना हो पाने की वज़ह ये है कि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच वैसा ताल मेल नही है जैसा कि होना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी और दूसरे चुनाव आयुक्त नवीन चावला के बीच कैसे रिस्ते है, थोड़ी बहुत सियासत की समझ रखने वाला आसानी से बता सकता है। ये भी सभी जानते है कि चुनाव आयुक्त नवीन चावला आयोग में सियासत की कौन सी पगडंडी पकड़ कर आयोग में दाखिल हुए है। कई दफे विभिन्न राजनीतिक दल उनकी निस्पक्षता पर सवाल खड़े कर चुके है। कांग्रेस को सियासी लाभ पहुचाने को लेकर भी उनकी आयोग में अपने सहयोगियों के बीच किरकिरी हो चुकी है। कई बार इसको लेकर विवादों में भी आ चुके है चावला साहब।
दरअसल जम्मू के मसले पर कोई आम राय और निर्णय ना हो पाने की वज़ह ये है कि तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच वैसा ताल मेल नही है जैसा कि होना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी और दूसरे चुनाव आयुक्त नवीन चावला के बीच कैसे रिस्ते है, थोड़ी बहुत सियासत की समझ रखने वाला आसानी से बता सकता है। ये भी सभी जानते है कि चुनाव आयुक्त नवीन चावला आयोग में सियासत की कौन सी पगडंडी पकड़ कर आयोग में दाखिल हुए है। कई दफे विभिन्न राजनीतिक दल उनकी निस्पक्षता पर सवाल खड़े कर चुके है। कांग्रेस को सियासी लाभ पहुचाने को लेकर भी उनकी आयोग में अपने सहयोगियों के बीच किरकिरी हो चुकी है। कई बार इसको लेकर विवादों में भी आ चुके है चावला साहब।

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