
भाजपा जब अपने दो दिन के राष्ट्रीय अधिवेशन में हिंदुत्व को आर्थिक विकास से जोड़कर पेश करती है तो एक नहीं अनेक प्रश्न पैदा होते हैं। जिन नीतियों पर वर्तमान सरकार चल रही है, उन्हीं का अनुमोदन करने से देश के अधिकतर भाग गुजरात-महाराष्ट्र के स्तर पर तो नहीं पहुंच सकते। सेंसेक्स की उछाल, वार्षिक विकास दर, और विशेष आर्थिक क्षेत्रों की श्रृंखला से जो तस्वीर दिखती है वह गरीबी उन्मूलन की विफलता, बढ़ती बेरोजगारी और किसानों की आत्महत्याओं में तो नहीं झलकती। इस स्थिति को बदलने के लिए मोदी मॉडल से कुछ अधिक और कुछ मौलिक चाहिए। भाजपा और राजग के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी ने नारे ‘पार्टी विद डिफरेंस’ यानी अलग तरह की पार्टी को तो दोहराया लेकिन यह नहीं बताया कि भाजपा कांग्रेस से किस मायने में भिन्न होगी। क्या भाजपा ने कोई वैकल्पिक अर्थनीति विकसित की है? अगर की है तो उसे आम मतदाता को समझाना होगा कि वह है क्या और वह वर्तमान विसंगतियों को कैसे दूर करेगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो मतदाता भाजपा की पिछली सरकार की सफलता-असफलता को ही अपना मापदंड बनाएगी।राम मंदिर और धारा तीन सौ सत्तर पर चुप्पी साधना भाजपा की मजबूरी है। उसे मालूम है कि वह अपने बूते पर बहुमत नहीं ला सकती है। जो हिसाब पार्टी के रणनीतिकारों ने लगाया है उससे राजग को तीन सौ साठ सीटें मिल सकती हैं। याद रखना चाहिए कि वह शिखर लक्ष्य है। इसमें वे सारी सीटें शामिल हैं जो भाजपा और सहयोगी दलों ने पिछले कई चुनावों में कभी भी जीती हों। यानी आशा की जाती है कि इन सभी दलों ने विभिन्न परिस्थितियों में जब-जब भी जहां-जहां भी सफलता पाई वह सब घनीभूत होकर एक साथ 2009 में उसकी झोली में आ टपकेगी। सपने सौ प्रतिशत शायद ही कभी पूरे होते हों। भाजपा गठबंधन का दो-तिहाई सपना भी पूरा हो जाए तो बस बहुमत भर मिलेगा। उसमें भाजपा का हिस्सा दो सौ से कम ही होगा। ऐसे में भाजपा अपने जनसंघ के आदर्र्शों और नारों पर कैसे लौट सकती थी। इसलिए अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के विरूद्ध जनमत जगाने से ही काम चलाया जाएगा।लेकिन मनमोहन सरकार पर कानून व्यवस्था और आतंकवाद के मोर्र्चों पर नाकामी का आरोप लगाने के बाद आतंकवाद और माआ॓वादी हिंसा के विरूद्ध निर्णायक जंग लड़ने का आश्वासन देने वाले लालकृष्ण आडवाणी को थोड़ा सा आत्मविश्लेषण भी करना चाहिए। कश्मीर में आतंकवाद से कारगर तरीके से लड़ने के बारे में उन्होंने कोई आदर्श तो स्थापित नहीं किया। गृहमंत्री के नाते वे यह दावा तो नहीं कर सकते कि उनके शासनकाल में पाक प्रेरित आतंकवाद को कुचलने में कोई महत्वपूर्ण समरनीतिक या राजनीतिक सफलता मिली थी। पढ़ी-लिखी जनता को तो कंधार कांड भी याद होगा, जिसमें एक खूंखार आतंकवादी सरगना को स्वयं विदेश मंत्री जसवंत सिंह मुक्त कर आए। बरसों पहले तब के गृहमंत्री मुफ्ती सईद की बेटी के अपहरण की घटना हुई थी। और रूबैया सईद को छुड़ाने के लिए कई आतंकवादियों को छोड़ दिया गया। दोनों घटनाओं के बाद आतंकवाद थमा नहीं, कुछ तीव्र ही हो गया। इसलिए भाजपा और उसके सहयोगियों ने अगर तय किया है कि आतंकवाद के बारे में सरकार की नीति ‘शून्य सहन’ की है तो फिर न केवल वैसी ही सोच पैदा करनी होगी, अपितु वैसी ही रणनति भी बनानी होगी। भाजपा नेताओं ने कहा कि पार्टी कांग्रेस से हर मामले में अलग होगी। जिन बातों के लिए हम कांग्रेस सरकार की आलोचना करते हैं उन पर पार्टी वैकल्पिक नीतियां अपनाएगी। लेकिन इससे अधिक आवश्यक यह है कि भाजपा स्वयं भी मित्र दिखे।आडवाणी ने भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से कहा कि वे अपनी कार्यकुशलता सुधारें क्योंकि लोकसभा चुनाव से पहले कई विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। विधानसभा और लोकसभा के चुनावों के मुद्दे प्राय: अलग-अलग होते हैं, लेकिन राज्यों में चुनावी सफलता केंद्रीय स्तर पर पार्टी के लिए एक अनुकूल वातावरण पैदा करती है। प्रश्न है कि क्या मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी गुजरात की सफलता दोहराई जाएगी। मोदी करिश्मे का एक पहलू है कि उसमें सत्तारूढ़ दल के लिए मतदान में पैदा होने वाली ऊब को हटाया जा सकता है। भारतीय मतदाता को असहिष्णु मतदाता माना जाता है। पांच वर्ष तक एक पार्टी की सरकार को सहन करना ही उसके लिए कठिन हो जाता है। इसलिए अधिकतर सरकारें एक कार्यकाल पूरा करते-करते लोकप्रियता खो देती हैं। दुबारा चुन कर आना आसान नहीं होता। मोदी का करिश्मा इसी में है कि वे एक बार नहीं दो बार पुनर्निवाचित हो गए। लेकिन भाजपा शासित मध्य प्रदेश और राजस्थान की सरकारों के नाम ऐसी कोई उपलब्धियां नहीं कि मतदाता उन्हें फिर से चुन लें। मध्य प्रदेश में कुछ समय पहले हुए उप चुनावों ने चेताया भी है कि मामला आसान नहीं। राजस्थान की महारानी अपने समर्थन आधार को एक नहीं रख पाई है। गुर्जर आंदोलन ने उसे बांट दिया है। मध्य प्रदेश में उमा भारती और राजस्थान में क्रुद्ध गुर्जरों को भाजपा कैसे अपने अनुकूल या अप्रासंगिक करती है इसी पर काफी हद तक सफलता निर्भर करती है।भाजपा की समरनीति के दो पहलू हैं। कांग्रेस सरकार को एक असहाय और बंधुआ सरकार के रूप में प्रचारित करने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दूसरों के इशारों पर चलने वाला प्रशासक बताया जाने लगा है। पूर्व भाजपा मंत्री जसवंत सिंह के अनुसार ‘पहले मैं मानता था कि मनमोहन सिंह एक स्वतंत्र प्रशासक हैं, लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि इशारों पर ही चलते हैं।’ ‘रिमोट कंट्रोल’ का यह आरोप शुरू से लगता रहा है। लेकिन हाल की कुछ घटनाओं, विशेषकर परमाणु करार पर गतिरोध के बाद से सरकार पर यह आरोप लगने लगा है कि वामपंथी दल उसे डरा-धमका कर नीतियां बदलने पर मजबूर कर रहे हैं। इस मामले में दो साम्यवादी दलों माकपा और भाकपा की भूमिका को सबसे अधिक इंगित किया जाता है। अपने भाषण में आडवाणी ने इसे राजनीति का ‘क्रिमलिनीकरण’ कहा। क्रिमलिन सोवियत संघ में सत्तारूढ़ साम्यवदी दल का मुख्यालय था। आडवाणी के अनुसार भारतीय राजनीति को साम्यवादी दलों के दबाव से मुक्त किया जाना चाहिए। भाजपा और साम्यवादियों का सीधा टकराव नहीं है। जहां कम्युनिस्ट पार्टियां सत्ता में हैं वहां भाजपा का प्रभाव नगण्य है और जहां भाजपा प्रभावशाली है वहां वामपंथी पांव जमाने में सफल नहीं हुए हैं। फिर भी वामपंथियों को माआ॓वादियों से जोड़ कर भाजपा कम्युनिस्ट विरोधी भावना पैदा करने का प्रयास कर रही है। जिस संगठन के माध्यम से भाजपा यह अभियान चलाना चाहती है उसकी सेहत की परीक्षा आवश्यक है। क्रिकेट के मुहावरे का उपयोग करें तो मैदान में उतरने के लिए यह जांचना होगा कि वह कितनी ‘फिट’ है।