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Sunday, September 16, 2012

लेफ्ट और राईट – अब साथ जरुरी

खुद को आम आदमी की सरकार कहने वाली यूपीए सरकार लगता है सत्ता के मद में इतनी चूर हो चुकी है कि उसे आम अवाम की आह तक नही सुनाई देती। यूपीए वन से यूपीए टू तक आम आदमी लगातार महंगाई से जूझ रहा है.....लेकिन केंद्र की यूपीए सरकार को ये कोई मुद्दा नही लगता इसकी वज़ह है महंगाई के मुद्दे के बावजूद पिछली लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत, तभी तो आम आदमी की बात करने वाली कांग्रेस इतनी दुस्साहसी हो गयी है। जो अपनी दूसरी पारी में मदमस्त पागल हाथी की तरह बेतुके फैसले करती जा रही है। कांग्रेस के इन जन विरोधी फैसलों पर नकेल कसने वाला भी कोई नही है......पिछली यूपीए सरकार में तो कम से कम लेफ्ट पार्टियां हाथियों के झुंड में उस ऊंट की भूमिका निभाती थे जो जरुरत पड़ने पर पागल हाथियों के कान मरोड़ते है।....लेकिन लेफ्ट पार्टियों की वो भूमिका यूपीए वन में ही न्यूक्लियर डील के मसले पर अमर सिंह और मुलायम सिंह की सियासी सौदेबाजी की भेट चढ़ गयी। लोकसभा चुनाव हुए तो बीजेपी के महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों के बावजूद कांग्रेस बेहतर स्थिति में आई......लेकिन यूपीए वन की वामपंथियों की भूमिका यूपीए टू में फिसल कर त्रिणमूल यानि ममता बैनर्जी के हाथों में आ गयी
......ममता ने कांग्रेस या यूं कहें कि यूपीए के जनविरोधी फैसलों पर वामपंथियों से भी कड़ा रुख अख्तियार किया और यूपीए को ऐसे मसलों पर नियंत्रित भी करती रहीं......लेकिन ममता दीदी ने जब से पश्चिम बंगाल की बागडोर सम्भाली है और राईटर्स विल्डिंग बैठना शुरु किया है तब से यूपीए के जनविरोधी फैसलों पर उनका विरोध महज रस्मअदायगी ही लगता है। यूपीए सरकार के दूसरे घटक दल, जो जनसरोकारो की बात करते है और बढ़ती महंगाई और यूपीए के महंगाई में इजाफा करने वाले फैसलों की मुखालफत करते दिखते है, उनका भी कमोवेश यही हाल है.....उनका विरोध अखबार और टेलीविजन पर तो दिखता है लेकिन उसका असर सरकारी तौर पर कही नही दिखता.....शायद उनका विरोध सियासी सहूलियत और सत्ता लोलुपता की उनकी निजी मजबूरियों के आगे दम तोड़ जाता है। दरअसल ये सरकार घोटालों के उस जादुई चिराग की तरह है जहां कब कौन सा घोटाला निकल जाए कोई नही कह सकता...ऐसे में किस घोटाले में किस सहयोगी दल का कितना शेयर होगा ये भी कहना जरा मुश्किल है। तो यूपीए नाम के हमाम में एक दूसरे की नंगई पर पर्दा डालना ही यूपीए गठबंधन सहयोगियों की फितरत सी हो गयी है। मुख्य विपक्ष यानि बीजेपी का विरोध तो सरकार के कान में जूं तक नही रेंग रहा है....उसकी वज़ह बहुत कुछ समूचे विपक्ष के एकजुट ना होने की वज़ह से भी है। इसमें सबसे प्रमुख भूमिका निभा रही है वो पार्टियां जो सियासी बहरुपियों के तौर पर सदन के भीतर अपनी पहचान कायम किये हुए है
.....जीं है समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आरजेडी और लोजपा जैसी पार्टियां ऐसी ही पार्टियों में शुमार है। ये सियासी बहरुपिये जनसरोकार के मसलों पर सदन के भीतर समूचे विपक्ष की एकता के नाम पर खड़े तो होते है लेकिन जब मामला क्लाइमेक्स पर पहुंचता है तो ये पिछले दरवाजे से लापता हो जाते है। इस सियासी बेर्शमी से सदन एक बार नही बल्कि कई बार दो चार भी हुआ है। ये पार्टीयां खुद को क्षेत्रिय तो कहती है लेकिन इनके सियासी सौदेबाजी में क्षेत्र हित कम और स्व हित ज्यादा होता है। कभी इन पर खुद को सीबीआई के चंगुल से बचने के नाम पर समझौता करने का आरोप लगता है तो कभी किसी जांच या सियासी जोडतोड़ की वज़ह से। कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि यही पार्टियां देश को एक तीसरा विकल्प देने की बात कर रही है। पैंतरे बदलने वाली ये सियासी ताकते सत्ता में आने के लिए लेफ्ट से दोस्ती गाठने के लिए तत्पर है लेकिन जनसरोकारों पर इनकी असल राजनैतिक इच्छाशक्ति हवा हो जाती है। कुल मिलाकर क्या आज जरुरत इस बात की नही कि जनसरोकार के मसले पर विपक्ष के बड़े स्टेक होल्डर एक हो
.....जी हां बीजेपी और लेफ्ट.........ये सवाल चौकाता जरुर है लेकिन, क्या जरुरी है महंगाई, गरीबी, भूख से आत्महत्या, हमारे बाजार पर विदेशी आधिपत्य आदि जैसे मसलों को हल करने के नाम पर  एक विचारधारा आड़े आए। जी हां जब यूपीए वन सरकार की विचारधारा को लेफ्ट नियंत्रित कर सकती है तो बीजेपी या एडनीए को क्यों नही ? बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विरोधी कुछ भी कहें लेकिन नीतीश कुमार ने पिछले सात सालों में बीजेपी के साथ सरकार चलाकर कम से कम एक सफल प्रयोग तो किया ही है, और लेफ्ट पार्टियां इसका लाभ उठा सकती है।

मौजूदा यूपीए सरकार जिस बेरहमी से महंगाई बढ़ा रही है और गरीबों के लिए स्लो प्वाइजन की स्थिति पैदा कर रही है, अपने बाजार को बंधक रख रही है.....उससे तो अच्छा है कि बीजेपी और लेफ्ट एक हो। क्योंकि मौजूदा सियासी सूरतेहाल में अब कोई नही पूछता राम मंदिर को.....मुसलमानों को लेकर बीजेपी की भूमिका में भी जबरदस्त तब्दीली आई है.....जब हम रहेंगे ही नही तो क्या हिन्दू क्या मुसलिम.....और क्या मन्दिर  और क्या मस्जिद.....फिलहाल जीना जरुरी है और ये सरकार जीने नही दे रही..... ये सरकार लगता है एसी कल्चर वालों की सरकार हो कर रह गयी है जो गरीबों की नही सोचती....इसके नेता और मंत्री एसी में रहते है एसी में सोचते है। यहां पर जमीन पर रह कर जमीनी लोगों को के बारे में सोचने वाले लेफ्ट नेताओं को ज्यादा सोचने की जरुरत है। असली लोकतंत्र वो है जो किसी भी किमत पर अपनी जनता को जिन्दा रखे। यूपीए सरकार के शासनकाल में इंसान की किमत घट रही है पैसे की दिन दुनी बढ़ रही है।टफपपके




Saturday, September 15, 2012

बिहार में रैलियों का रेला



बिहार में सियासी सरगर्मियां उफान पर हैं..तकरीबन सभी सियासी पार्टियां.. आम अवाम से सीधा संवाद करने की जुगत में लगीं है..हर किसी के पास अपने अपने मुद्दे है..जनसंवाद अब रैलीयों का रूप अखित्यार करने जा रहा है...जदयू और भाजपा ने तो रैली के लिए तारीख का ऐलान भी कर दिया है..वहीं लालू यादव की पार्टी आरजेडी मंथन में है....और बाकी दल अपने को आंक रहे है..कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बिहार में राजनीतिक तौर पर रैलीयों का मौसम आ रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता बिहार में कितनी है...इसे जरा नापना मुश्किल है...साल 2005 के बाद साल 2010 में भी सुशासन की वजह से नीतीश दोबारा सत्ता में आए...लेकिन इस मजे सियासी खिलाड़ी को इस बात का अहसास है कि...किसी भी नारे का वजूद एक वक्त के बाद खत्म हो जाता है। जनता सुशासन को दु;शासन करार दे..इससे पहले जनता के मन में दूसरी सोच डालने की गरज से नीतीश ने विशेष राज्य के मुद्दे को विकास के साथ जोड़ दिया, इसे लेकर वो अधिकार रैली करने जा रहें है।
 बिहार में एनडीए की सरकार है...बीजेपी सरकार की बी टीम मानी जाती है..लेकिन बी को भी इस बात का इल्म है कि अगर वजूद को बचाए रखना है तो...जनता से संवाद होना चाहिए..लिहाजा इस पार्टी ने भी बिहार में रैली का आयोजन किया है। लगातार दो चुनाव हारने के बाद बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी हांफ रही है..लेकिन लालू प्रसाद यादव दिल्ली से उर्जा ले बिहार में अपना जनाधार पाने के लिए बेताब दिख रहे है..यात्रा दर यात्रा का दौर जारी है...कहते हैं कि मैं भी रैली करूंगा...लेकिन जरा रूक कर कांग्रेस एक लंबे अर्से से जनता के बीच जाने की कोशिश में है...लेकिन कभी गुटबाजी ने मारा तो कभी अपनी गलतियों ने...कई बार ऐसा हुआ कि चलना चाहा तो आलाकमान ने रोक दिया..पर अब जनता के बीच फिर जाना चाह रही है पार्टी एक जमाना था जब बिहार में कहा जाता था कि जिधर राम विलास उधर की सत्ता विलास..लेकिन ये मिथक अब टूट गया है...रामविलास खिसकती जमीन को पाने के लिए जनता के बीच उतरना चाह रहे हैं...जिस पार्टी का जैसा वजूद है..वो उसी रूप में जनता के बीच जाने की कवायद में है। रैलियों के रेले के बीच लोकतंत्र की वो सच सामने दिख रहा है कि..जिसमे कहा जाता है कि लोकतंत्र में जनता ही मालिक है..लिहाजा चुनाव की आहट पा सभी राजनीतिक दल मालिक के पास अपने अपने हिसाब से जाने की सोच रहे हैं।

Thursday, June 14, 2012

जी हां, ये मुलायम और ममता का कांग्रेस से ‘बदला’ ही है।

ममता और मुलायम का मात से कांग्रेस की पीढ़ा समझ में आती है......जिस तरीके से दोनों ही नेताओं ने राष्ट्रपति पद पर कांग्रेस और सोनिया की पसंद प्रणब मुखर्जी को खारिज करते हुए इस पद के लिए खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम आगे किया उससे खुद कांग्रेस अंभित है। ममता और मुलायम के इस दाव से सियासी गलियारों में गैर कांग्रेसी खेमें में एक अनोखा संतोष है......चाहें वो मौजूदा सरकार में कांग्रेस का सहयोगी हो या फिर कोई पुराना सहयोगी। दरअसल कांग्रेस जिस तरह की सियासत करती है और खास तौर से अपने सहयोगियों के साथ वैसे में उसते साथ इस तरह का व्यवहार काफी मौजू है.......मौजूदा सियासी सूरते हाल में कांग्रेस की फितरत इस तरह की बन गयी है कि वो अपने सहयोगियों और मददगारों को भी नुकसान पहुटाने से बाज नही आती। खुद गठबंधन धर्म की मर्यादा की बात करने वाली सबसे पुरानी पार्टी ने अहम मसलों पर दूसरे दलों से लाभ लेने के बाद जिस तरीके से उनके बुरे वक्त मैं दगा देने का इतिहास कायम किया है....उसमें इस दल का की सानी नही......चाहें न्यूक्लियर डील पर मदद करने वाले मुलायम को धोखा देने की बात हो या फिर लालू के तमाम सहयोग के बावजूद उनके बुरे वक्त में अकेले छोड़ने का मामला......चाहें लेफ्ट को लूटने की कहानी हो या फिर अपने ही सहयोगी एनसीपी को हड़पने की साजिश। इकलौती ममता ही ऐसी नेता है जिसने कांग्रेस को वक्त दर वक्त सही सबक सिखाया है और कांग्रेसी दाव से ही कांग्रेसियों धरासाई करती रही हैं। ममता का पुराना कांग3एसी होना इस खासियत की वज़ह हो सकती है। मुलायम और ममता के इस सियासी सबक को कांग्रेस के मौजूदा रणनीतिकार समझ ले तो तो बेहतर होगा।

तेलंगाना: बीजेपी के कब्जे वाली इकलौती लोकसभा सीट भी जा सकती है हाथ से

BJP MP Bandaru Dattatreya आंध्रप्रदेश से अलग होने के बाद वर्तमान में तेलंगाना के पास लोकसभा की 17 और विधान सभा की 119 सीटें रह गयी ह...