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Wednesday, December 18, 2013

देवयानी खोब्रागड़े मामला - कहां है महिलावादी संगठन ?

भारतीय राजनयिक देवयानी खोब्रागड़े के साथ अमेरिका में हुए दुर्व्यवहार के कई दिन बीत चुके है। आखिरकार देश की हूकूमत ने हल्के और सस्ते अंदाज में ही सही कड़ी प्रतिक्रिया दी। लेकिन ताज्जुब की बात ये कि बात बात पर महिला मुद्दों को लेकर सड़को पर उतरने वाली तथाकथिक महिलावादी और उनके संगठन कहां है ? क्या वातानुकलित दफ्तर और चैनलों में बैठ कर तीखी बहस से उनको फुर्सत नही ? ऐसे तो हर रोज जस्टिस गांगुली को लेकर सड़को पर दिख जाती है। 

कल सोफिया हयात के मसले पर भी अरमान कोहली के खिलाफ प्रदर्शन देखने को मिले। पिछले दिनों तरुण तेजपाल को लेकर भी सड़कों पर ऐसी महिलावादी संगठनों का प्रदर्शन देखने को मिला। लेकिन देवयानी खोब्रागड़े के साथ अमेरिका में हुए दुर्व्यवहार पर यूएस एम्बेसी तो क्या देश के किसी हिस्सें में कोई खास विरोध प्रदर्शन देखने को नही मिला। मुझे माफ करियेगा....भारत में ऐसे कई महिलावादी एनजीओं (संगठन) है जिनकी अर्थव्यवस्था की नीव अमरीका में ही कही दिखती नजर आती है और इनके कर्ताधर्ता और संचालकों का वहां आना जाना होता है।.....इस बात का जिक्र करने का मेरा मकसद महज इतना है कि अमरीका में भी जाकर विरोध प्रदर्शन कर सकते है ये संगठन ( अभी तक किया नही है।) । 
लगता है इन संगठनों को इस मसले में टीआरपी नही दिखती। कम से कम विदेश मंत्रालय पर विरोध प्रदर्शन किया होता। महिला बिल को लेकर तो संसद के सामने जहां किसी को फटकने तक नही दिया जाता वहां तक पहुच गये थे महिलावादी संगठन। कम से कम विदेश मंत्री का तो घेराव कर दिया होता। यू एस एम्बेसी के बाहर ही नारे लगा दिये होते।

Tuesday, December 17, 2013

ये देश का अपमान है।

इंडियन डिप्लोमैट देवयानी खोबरागडे की गिरफ्तारी और कपड़े उतारकर तलाशी लेने के मसले पर अपने विदेश मंत्री ने बड़ा ही डिप्लोमेटिक रुख अख्तियार किया.....एक तो लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के विरोध स्वरुप यूएस कांग्रेस के प्रतिनिधियों से मिलने के इंकार के बाद खुद मिलने चले गये और दूसरी तरफ इस घटना को देश का अपमान करार दिया। अरे भाई इतना ही अपमानित हो तो मुलाकात की क्या जरुरत थी। आप भी विरोध स्वरुप मुलाकात नही करते। ऐसी अपमान की घटनाओं से भारत के कई आम और खास दो चार हो चुके है.....लेकिन सरकार रस्म अदायगी के सिवा कुछ नही करती। ये घटना अपने आप में बेहद शर्मनाक है क्योंकि इससे पहले इस तरह की जो भी घटनाएं होती थी तो वो सुरक्षा के नाम पर एयपोर्ट पर होती थी। लेकिन एक आर्थिक अपराध की आरोपी महिला राजनयिक के साथ ये कैसा सलूक ?....आखिर कपड़ा किस बात पर उतरवा कर तलाशी ली गयी ? हैरत करने वाली पहली बात ये की एक महिला के साथ ऐसा सलूक किया गया....दूसरी ये कि एक देश के राजनयिक के साथ ऐसा किया गया जिसे कुछ खास विशेषाधिकार प्राप्त होते है। कायदन तो राजनयिक की गिरफ्तारी ही नही होनी चाहिए थी....भारतीय दूतावास और भारत सरकार को भरोसे में लेकर कोई कार्रवाही की जानी चाहिए थी....लेकिन अमरीकी पुलिस ने ऐसा कत्तई नही किया....दूसरी धृष्टता ये कि उस महिला राजनयिक को हथकड़ी पहनाई गयी और तीसरी और सबसे शर्मनाक ये कि उनके कपड़े उतरवा कर तलाशी ली गयी। खुद को सभ्य कहने वाला अमरीकी समाज जहां महिला अधिकारों और मानवीय अधिकारों को लेकर लोग सचेत रहते है और थोड़ी थोड़ी ज्यादतियों पर आंदोलन पर उतारु हो जाते है वो आखिर खामोश क्यूं है। ताज्जुब की बात ये कि मामले की शुरुआत ही घरेलू नौकर के अधिकारों के हनन को लेकर थी....उस जांच में अमरिकी पुलिस ने एक महिला और सम्मनित देश की एक राजनयिक के ही अधिकारों और सम्मान का हनन कर दिया।.........एक भारतीय के अंदर इसे लेकर गुस्सा तो जरुर है लेकिन इस सरकार का क्या करें जिसमें ऐसे मोर्चो पर रीढ़ की हड्डी ही नही दिखती।
आज 16 दिसम्बर- दिल्ली गैंगरेप की बरसी थी, हमारे सक्षम मंत्रियो और नेताओं ने महिला अधिकारों और महिला सुरक्षा को लेकर लम्बी लम्बी झोड़ी...... देवयानी खोबरागडे के मसले पर डिप्लोमैटिक रुख अख्तियार करने वाले विदेश मंत्री सलमान खुर्शिद ने तो दामिनी पर एक नज्म भी लिख डाली है। लेकिन उनकी असल ड्यूटी पर उन्होने हिलाहवाली कर डाली........ये मामला महज डिप्लोमेसी का नही देश की इज्जत से भी जुड़ा है। देवयानी खोबरागडे के प्रति सलमान खुर्शिद साहब की जिम्मेदारी ज्यादा बनती है क्योंकि वो विदेश में भारतीय दूतावास की एक अधिकारी है। एक बेटी के साथ ऐसा सलूक होने पर एक पिता का जो रुख होता है वो रुख अख्तियार करना चाहिए था सलमान खुर्शिद साहब को लेकिन उन्होने ऐसा नही किया।

Saturday, September 21, 2013

सियासत की वेदी पर सेना का मनोबल

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह का रेवाड़ी में नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा करना और सेना की तरफ से लगाये गये आरोप महज इस्तेफाक नही हो सकते। सेना की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने के वक्त से ही इस मसले पर सियासत की बू आती है। आएगी भी क्यूं नही, जनरल मोदी के सुर में सुर मिला कर सियासी जो हो गये, अगर नही हुए तो सियासी मान लिए गये है। तभी तो जनरल सिंह पर नये ताजा आरोपों के लगने के बाद से सियासी बयानबाजियों की बाढ़ सी गयी है।  जनरल वी के सिंह पर आरोप लगे है कि उन्होने सेना के गुप्त कोष का इस्तेमाल कर जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की थी। ये आरोप मिलिट्री ऑपरेशन्स के डीजी लेफ़्टिनेंट जनरल विनोद की अध्यक्षता में गठित जांच दल दल ने लगाया है। जनरल वीके सिंह की गठित की गई विवादित मिलिट्री इंटेलिजेंस यूनिट- टेक्निकल सर्विसिस डिवीजन के क्रियाकलापों की जांच के बाद ये बातें लेफ़्टिनेंट जनरल विनोद ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज की है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टेक्निकल सर्विसिस डिवीजन ने कथित तौर पर अवैध रूप से सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के फ़ोन टेप किए थे। हलांकि भारतीय सेना पर किसी तरह का शक करना लाजमी नही फिर भी भूतकाल में सेना पर सियासी हस्तक्षेप के अनुभव मजबूर कर ही देते है।

रेवाड़ी में बीजेपी के नये पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा करने से पहले कोई भी ये बात दावें के साथ नही कह सकता था कि जनरल वी के सिंह बीजेपी या बीजेपी की नीतियों को करीबी है। ज्यादा से ज्यादा उनको अन्ना हजारे के सहयोगी के तौर पर देखा जा रहा था। क्योंकि अन्ना हजारे सभी सियासी पार्टियों से एक समान दूरी बनाते हुए अपने आंदोलन को जारी रखे हुए है। सेवानिवृत्ति के बाद से ही जनरल वी के सिंह की अन्ना आंदोलन में सक्रियता साफ तौर पर देखी गयी, यूपीए सरकार की नाक में दम करने वाले हर उस अभियान में जनरल ने हिस्सा लिया जो सरकार के नीतियों के विरोध में था। केंद्र की यूपीए सरकार को इससे असहजता जरुर हो रही थी क्योंकि हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी जनरल ने रिटायरमेंट के बाद इतनी सक्रियता से किसी जन आंदोलन में हिस्सा नही लिया था। आजाद भारत में कोई जनरल रिटायरमेंट के बाद अपनी ही सरकार के सामने इतने मुखालफती तेवर में कभी सामने नही आया। ये सरकार के लिए वाकई असहज करने वाली स्थिति थी। लेकिन दूसरी तरफ यूपीए सरकार को इस बात का संतोष था कि जनरल की गतिविधियां पूर्णत गैर राजनीतिक थी। टीम अन्ना में टूट के बाद जनरल वी के सिंह गैर राजनीतिक सोच वाले अन्ना के साथ ही जुड़े रहे।
वो अरविन्द केजरीवाल के साथ वैकल्पिक राजनीति वाली योजना के साथ खुद को जोड़ने से इंकार करते रहे। अन्ना का अभियान मंद पड़ता गया लेकिन जनरल सिंह उनके साथ जुड़े रहें और देश भर में कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर अन्ना के आंदोलन को आगे बढ़ाने का प्रयास भी करते रहे।
देश के सेना प्रमुख रहते हुए जनरल वी के सिंह तब विवाद में आए जब उन के सर्विस रिकॉर्ड में उनकी दो जन्मतिथि पाई गई, पहली 10 मई 1950 और दूसरी 10 मई 1951,  सर्विस रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ सेनाध्यक्ष के मैट्रिक प्रमाणपत्र में उनकी जन्मतिथि 10 मई 1951 बताई गई थी। जबकि सेना में प्रवेश के लिए संघ लोक सेवा आयोग के फ़ॉर्म में उनकी जन्मतिथि 10 मई 1950 थी। इस मसले को लेकर वो सुप्रीम कोर्ट भी गये थे। उनके इस मसले को वर्तमान सेना प्रमुख जनरल विक्रम सिंह की नियुक्ति से भी जोड़ कर देखा गया। सेना के सूत्रों की माने तो जनरल वीके सिंह नही चाहते थे कि विक्रम सिंह सेना प्रमुख बने। यही वज़ह थी कि इतने सम्मानजनक ओहदे पर रहने के बावजूद उन्होने वो किया जो आज तक किसी सेना प्रमुख ने नही किया था। हिन्दुस्तान के इतिहास में ये पहली घटना थी।
अब वी के सिंह पर लगे आरोप पर एक बार फिर नये सिरे से सियासत शुरू हो गई है। कांग्रेस जहां इस मसले को संवेदनशील मान रही है वही बीजेपी को इसमें सियासी साजिश की बू आ रही है। जनरल वी के सिंह पर लगे आरोप से रक्षा विभाग और सेना में खलबली मची हुई है। रक्षा विशेषज्ञ इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण मान रहे है। उनका मानना है कि ऐसी कई जांच सेना में होती रहती है, देश की सुरक्षा और सेना के मनोबल के लिए उसे सार्वजनिक नही किया जाता। ऐसे मामलों पर राजनीति ठीक नहीं है क्योंकि इससे सेना के मनोबल पर असर पड़ता है।
जनरल वी के सिंह ने भी अपने तरीके से इन आरोपों का जवाब देना शुरु कर दिया है, जो सियासी कम खुलासे ज्यादें के रुप में सामने भी आ रहे है। दुसरी तरफ सरकारी और विपक्षी धड़ों से जो बयान  आ रहें है वो भी म्यान से निकली तलवारों के मानिन्द ही है। अख़बारों और न्यूज चैनलों में भी ये नुरा कुस्ती बज़ाफ्ता दिख भी रही है। लेकिन इन सबके बीच सेना की छवि तार तार होती दिख रही है। हिन्दुस्तान में सेना को बड़े ही आदर के साथ देखा जाता है। लेकिन सियासत वो हमाम है जिसमें सभी नंगे होते है, और जो नही होते वो कर दिये जाते है। अगर इसमें सेना भी शामिल होगी तो ये इसकी छवि के लिए शुभ संकेत नही है।


तेलंगाना: बीजेपी के कब्जे वाली इकलौती लोकसभा सीट भी जा सकती है हाथ से

BJP MP Bandaru Dattatreya आंध्रप्रदेश से अलग होने के बाद वर्तमान में तेलंगाना के पास लोकसभा की 17 और विधान सभा की 119 सीटें रह गयी ह...