खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और डीजल,
रसोई गैस की किमतों में यूपीए सरकार द्वारा किया गये इजाफे के बाद ममता बैनर्जी के
आंखे तरेरने और समर्थन वापसी की धमकी के बाद सियासी हलचल तेज हो गयी है। सभी दल
अपनी सियासी सौदेबादी की संभावनाओं को टटोलना शुरु कर दिये है। यूपीए सरकार के इस
मौजूदा संकट के आलोक में कुछ दल समर्थन के बदले अपने राजनैतिक हित साधने की जुगत
में लग गये है। मिसाल के तौर पर पुराने सियासी सौदागर मुलायम सिंह को दोनों हाथ
में लड्डू नज़र आ रहा है तो दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ये
एलान किया है कि उनका समर्थन उसी को होगा जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा
दिलाएगा। तीसरी तरफ बीएसपी खामोश है, लेकिन वो भी अपने हितों को थामें मुफीद वक्त
का इंतजार कर रही है।.....ममता बैनर्जी ने जो रुख अख्तियार किया है उससे इत्तेफाक
रखने से इतर ये सियासी दल अपने हितों को साधने में लगे हुए है। इस वक्त मोटे तौर
पर बीजेपी और लेफ्ट को छोड़कर कोई ऐसा दल (बीजेडी, अकाली और अन्य की बात नही कर
रहा) नही है जो यूपीए के इस निर्णय का असरदार ढंग से विरोध करे
......अगर आप संकट की स्थिति में अपने स्वार्थपरक
शर्तों के साथ खड़े होते है तो आप कहां विरोध कर रहें है? मुलायम और
नीतीश यही कर रहें है। अगर आप रिटेल में एफडीआई, डीजल और रसोई गैस की बढ़ी किमतों
का विरोध कर रहे है और इस मुद्दे पर यूपीए अल्पमत में आती है तो आप उनकी मदद
करेंगे ?.....य़े कैसा विरोध है? ऐ जनता के तथाकथित नुमाइंदों कुछ तो रहम
करो...... यूपीए सरकार के लिए मौजूदा संकट लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक सबक के तौर
पर सामने आया है। कायदे से यूपीए को सबक मिल जाना चाहिए......अपने सियासी हितों को
जनता के हितों के सामने त्यागने में ही भलाई है नही तो जनता जब फैसले पर उतरेगी तो
सियासी सूरतेहाल कुछ और होगा......चूकि जनता की बारी में अभी वक्त है तो यूपीए के
मनमौजी के माफिक भी कुछ सियासी दल अपनी मनमर्जी कर सकते है। लेकिन ममता बैनर्जी ने
जो राकजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाई है...उसके साथ सभी सियासी दलों को खड़ा होने की
जरुरत है क्योंकि अंतत: ये जनता के हित में ही है।



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