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Saturday, September 21, 2013

सियासत की वेदी पर सेना का मनोबल

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह का रेवाड़ी में नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा करना और सेना की तरफ से लगाये गये आरोप महज इस्तेफाक नही हो सकते। सेना की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने के वक्त से ही इस मसले पर सियासत की बू आती है। आएगी भी क्यूं नही, जनरल मोदी के सुर में सुर मिला कर सियासी जो हो गये, अगर नही हुए तो सियासी मान लिए गये है। तभी तो जनरल सिंह पर नये ताजा आरोपों के लगने के बाद से सियासी बयानबाजियों की बाढ़ सी गयी है।  जनरल वी के सिंह पर आरोप लगे है कि उन्होने सेना के गुप्त कोष का इस्तेमाल कर जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की थी। ये आरोप मिलिट्री ऑपरेशन्स के डीजी लेफ़्टिनेंट जनरल विनोद की अध्यक्षता में गठित जांच दल दल ने लगाया है। जनरल वीके सिंह की गठित की गई विवादित मिलिट्री इंटेलिजेंस यूनिट- टेक्निकल सर्विसिस डिवीजन के क्रियाकलापों की जांच के बाद ये बातें लेफ़्टिनेंट जनरल विनोद ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज की है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टेक्निकल सर्विसिस डिवीजन ने कथित तौर पर अवैध रूप से सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के फ़ोन टेप किए थे। हलांकि भारतीय सेना पर किसी तरह का शक करना लाजमी नही फिर भी भूतकाल में सेना पर सियासी हस्तक्षेप के अनुभव मजबूर कर ही देते है।

रेवाड़ी में बीजेपी के नये पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा करने से पहले कोई भी ये बात दावें के साथ नही कह सकता था कि जनरल वी के सिंह बीजेपी या बीजेपी की नीतियों को करीबी है। ज्यादा से ज्यादा उनको अन्ना हजारे के सहयोगी के तौर पर देखा जा रहा था। क्योंकि अन्ना हजारे सभी सियासी पार्टियों से एक समान दूरी बनाते हुए अपने आंदोलन को जारी रखे हुए है। सेवानिवृत्ति के बाद से ही जनरल वी के सिंह की अन्ना आंदोलन में सक्रियता साफ तौर पर देखी गयी, यूपीए सरकार की नाक में दम करने वाले हर उस अभियान में जनरल ने हिस्सा लिया जो सरकार के नीतियों के विरोध में था। केंद्र की यूपीए सरकार को इससे असहजता जरुर हो रही थी क्योंकि हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी जनरल ने रिटायरमेंट के बाद इतनी सक्रियता से किसी जन आंदोलन में हिस्सा नही लिया था। आजाद भारत में कोई जनरल रिटायरमेंट के बाद अपनी ही सरकार के सामने इतने मुखालफती तेवर में कभी सामने नही आया। ये सरकार के लिए वाकई असहज करने वाली स्थिति थी। लेकिन दूसरी तरफ यूपीए सरकार को इस बात का संतोष था कि जनरल की गतिविधियां पूर्णत गैर राजनीतिक थी। टीम अन्ना में टूट के बाद जनरल वी के सिंह गैर राजनीतिक सोच वाले अन्ना के साथ ही जुड़े रहे।
वो अरविन्द केजरीवाल के साथ वैकल्पिक राजनीति वाली योजना के साथ खुद को जोड़ने से इंकार करते रहे। अन्ना का अभियान मंद पड़ता गया लेकिन जनरल सिंह उनके साथ जुड़े रहें और देश भर में कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर अन्ना के आंदोलन को आगे बढ़ाने का प्रयास भी करते रहे।
देश के सेना प्रमुख रहते हुए जनरल वी के सिंह तब विवाद में आए जब उन के सर्विस रिकॉर्ड में उनकी दो जन्मतिथि पाई गई, पहली 10 मई 1950 और दूसरी 10 मई 1951,  सर्विस रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ सेनाध्यक्ष के मैट्रिक प्रमाणपत्र में उनकी जन्मतिथि 10 मई 1951 बताई गई थी। जबकि सेना में प्रवेश के लिए संघ लोक सेवा आयोग के फ़ॉर्म में उनकी जन्मतिथि 10 मई 1950 थी। इस मसले को लेकर वो सुप्रीम कोर्ट भी गये थे। उनके इस मसले को वर्तमान सेना प्रमुख जनरल विक्रम सिंह की नियुक्ति से भी जोड़ कर देखा गया। सेना के सूत्रों की माने तो जनरल वीके सिंह नही चाहते थे कि विक्रम सिंह सेना प्रमुख बने। यही वज़ह थी कि इतने सम्मानजनक ओहदे पर रहने के बावजूद उन्होने वो किया जो आज तक किसी सेना प्रमुख ने नही किया था। हिन्दुस्तान के इतिहास में ये पहली घटना थी।
अब वी के सिंह पर लगे आरोप पर एक बार फिर नये सिरे से सियासत शुरू हो गई है। कांग्रेस जहां इस मसले को संवेदनशील मान रही है वही बीजेपी को इसमें सियासी साजिश की बू आ रही है। जनरल वी के सिंह पर लगे आरोप से रक्षा विभाग और सेना में खलबली मची हुई है। रक्षा विशेषज्ञ इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण मान रहे है। उनका मानना है कि ऐसी कई जांच सेना में होती रहती है, देश की सुरक्षा और सेना के मनोबल के लिए उसे सार्वजनिक नही किया जाता। ऐसे मामलों पर राजनीति ठीक नहीं है क्योंकि इससे सेना के मनोबल पर असर पड़ता है।
जनरल वी के सिंह ने भी अपने तरीके से इन आरोपों का जवाब देना शुरु कर दिया है, जो सियासी कम खुलासे ज्यादें के रुप में सामने भी आ रहे है। दुसरी तरफ सरकारी और विपक्षी धड़ों से जो बयान  आ रहें है वो भी म्यान से निकली तलवारों के मानिन्द ही है। अख़बारों और न्यूज चैनलों में भी ये नुरा कुस्ती बज़ाफ्ता दिख भी रही है। लेकिन इन सबके बीच सेना की छवि तार तार होती दिख रही है। हिन्दुस्तान में सेना को बड़े ही आदर के साथ देखा जाता है। लेकिन सियासत वो हमाम है जिसमें सभी नंगे होते है, और जो नही होते वो कर दिये जाते है। अगर इसमें सेना भी शामिल होगी तो ये इसकी छवि के लिए शुभ संकेत नही है।


Wednesday, September 19, 2012

अपने सियासी हितो को छोड़ ममता का साथ दें।

खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और डीजल, रसोई गैस की किमतों में यूपीए सरकार द्वारा किया गये इजाफे के बाद ममता बैनर्जी के आंखे तरेरने और समर्थन वापसी की धमकी के बाद सियासी हलचल तेज हो गयी है। सभी दल अपनी सियासी सौदेबादी की संभावनाओं को टटोलना शुरु कर दिये है। यूपीए सरकार के इस मौजूदा संकट के आलोक में कुछ दल समर्थन के बदले अपने राजनैतिक हित साधने की जुगत में लग गये है। मिसाल के तौर पर पुराने सियासी सौदागर मुलायम सिंह को दोनों हाथ में लड्डू नज़र आ रहा है तो दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ये एलान किया है कि उनका समर्थन उसी को होगा जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाएगा। तीसरी तरफ बीएसपी खामोश है, लेकिन वो भी अपने हितों को थामें मुफीद वक्त का इंतजार कर रही है।.....ममता बैनर्जी ने जो रुख अख्तियार किया है उससे इत्तेफाक रखने से इतर ये सियासी दल अपने हितों को साधने में लगे हुए है। इस वक्त मोटे तौर पर बीजेपी और लेफ्ट को छोड़कर कोई ऐसा दल (बीजेडी, अकाली और अन्य की बात नही कर रहा) नही है जो यूपीए के इस निर्णय का असरदार ढंग से विरोध करे
......अगर आप संकट की स्थिति में अपने स्वार्थपरक शर्तों के साथ खड़े होते है तो आप कहां विरोध कर रहें है? मुलायम और नीतीश यही कर रहें है। अगर आप रिटेल में एफडीआई, डीजल और रसोई गैस की बढ़ी किमतों का विरोध कर रहे है और इस मुद्दे पर यूपीए अल्पमत में आती है तो आप उनकी मदद करेंगे ?.....य़े कैसा विरोध है? ऐ जनता के तथाकथित नुमाइंदों कुछ तो रहम करो...... यूपीए सरकार के लिए मौजूदा संकट लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक सबक के तौर पर सामने आया है। कायदे से यूपीए को सबक मिल जाना चाहिए......अपने सियासी हितों को जनता के हितों के सामने त्यागने में ही भलाई है नही तो जनता जब फैसले पर उतरेगी तो सियासी सूरतेहाल कुछ और होगा......चूकि जनता की बारी में अभी वक्त है तो यूपीए के मनमौजी के माफिक भी कुछ सियासी दल अपनी मनमर्जी कर सकते है। लेकिन ममता बैनर्जी ने जो राकजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाई है...उसके साथ सभी सियासी दलों को खड़ा होने की जरुरत है क्योंकि अंतत: ये  जनता के हित में ही है।

Sunday, September 16, 2012

लेफ्ट और राईट – अब साथ जरुरी

खुद को आम आदमी की सरकार कहने वाली यूपीए सरकार लगता है सत्ता के मद में इतनी चूर हो चुकी है कि उसे आम अवाम की आह तक नही सुनाई देती। यूपीए वन से यूपीए टू तक आम आदमी लगातार महंगाई से जूझ रहा है.....लेकिन केंद्र की यूपीए सरकार को ये कोई मुद्दा नही लगता इसकी वज़ह है महंगाई के मुद्दे के बावजूद पिछली लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत, तभी तो आम आदमी की बात करने वाली कांग्रेस इतनी दुस्साहसी हो गयी है। जो अपनी दूसरी पारी में मदमस्त पागल हाथी की तरह बेतुके फैसले करती जा रही है। कांग्रेस के इन जन विरोधी फैसलों पर नकेल कसने वाला भी कोई नही है......पिछली यूपीए सरकार में तो कम से कम लेफ्ट पार्टियां हाथियों के झुंड में उस ऊंट की भूमिका निभाती थे जो जरुरत पड़ने पर पागल हाथियों के कान मरोड़ते है।....लेकिन लेफ्ट पार्टियों की वो भूमिका यूपीए वन में ही न्यूक्लियर डील के मसले पर अमर सिंह और मुलायम सिंह की सियासी सौदेबाजी की भेट चढ़ गयी। लोकसभा चुनाव हुए तो बीजेपी के महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों के बावजूद कांग्रेस बेहतर स्थिति में आई......लेकिन यूपीए वन की वामपंथियों की भूमिका यूपीए टू में फिसल कर त्रिणमूल यानि ममता बैनर्जी के हाथों में आ गयी
......ममता ने कांग्रेस या यूं कहें कि यूपीए के जनविरोधी फैसलों पर वामपंथियों से भी कड़ा रुख अख्तियार किया और यूपीए को ऐसे मसलों पर नियंत्रित भी करती रहीं......लेकिन ममता दीदी ने जब से पश्चिम बंगाल की बागडोर सम्भाली है और राईटर्स विल्डिंग बैठना शुरु किया है तब से यूपीए के जनविरोधी फैसलों पर उनका विरोध महज रस्मअदायगी ही लगता है। यूपीए सरकार के दूसरे घटक दल, जो जनसरोकारो की बात करते है और बढ़ती महंगाई और यूपीए के महंगाई में इजाफा करने वाले फैसलों की मुखालफत करते दिखते है, उनका भी कमोवेश यही हाल है.....उनका विरोध अखबार और टेलीविजन पर तो दिखता है लेकिन उसका असर सरकारी तौर पर कही नही दिखता.....शायद उनका विरोध सियासी सहूलियत और सत्ता लोलुपता की उनकी निजी मजबूरियों के आगे दम तोड़ जाता है। दरअसल ये सरकार घोटालों के उस जादुई चिराग की तरह है जहां कब कौन सा घोटाला निकल जाए कोई नही कह सकता...ऐसे में किस घोटाले में किस सहयोगी दल का कितना शेयर होगा ये भी कहना जरा मुश्किल है। तो यूपीए नाम के हमाम में एक दूसरे की नंगई पर पर्दा डालना ही यूपीए गठबंधन सहयोगियों की फितरत सी हो गयी है। मुख्य विपक्ष यानि बीजेपी का विरोध तो सरकार के कान में जूं तक नही रेंग रहा है....उसकी वज़ह बहुत कुछ समूचे विपक्ष के एकजुट ना होने की वज़ह से भी है। इसमें सबसे प्रमुख भूमिका निभा रही है वो पार्टियां जो सियासी बहरुपियों के तौर पर सदन के भीतर अपनी पहचान कायम किये हुए है
.....जीं है समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आरजेडी और लोजपा जैसी पार्टियां ऐसी ही पार्टियों में शुमार है। ये सियासी बहरुपिये जनसरोकार के मसलों पर सदन के भीतर समूचे विपक्ष की एकता के नाम पर खड़े तो होते है लेकिन जब मामला क्लाइमेक्स पर पहुंचता है तो ये पिछले दरवाजे से लापता हो जाते है। इस सियासी बेर्शमी से सदन एक बार नही बल्कि कई बार दो चार भी हुआ है। ये पार्टीयां खुद को क्षेत्रिय तो कहती है लेकिन इनके सियासी सौदेबाजी में क्षेत्र हित कम और स्व हित ज्यादा होता है। कभी इन पर खुद को सीबीआई के चंगुल से बचने के नाम पर समझौता करने का आरोप लगता है तो कभी किसी जांच या सियासी जोडतोड़ की वज़ह से। कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि यही पार्टियां देश को एक तीसरा विकल्प देने की बात कर रही है। पैंतरे बदलने वाली ये सियासी ताकते सत्ता में आने के लिए लेफ्ट से दोस्ती गाठने के लिए तत्पर है लेकिन जनसरोकारों पर इनकी असल राजनैतिक इच्छाशक्ति हवा हो जाती है। कुल मिलाकर क्या आज जरुरत इस बात की नही कि जनसरोकार के मसले पर विपक्ष के बड़े स्टेक होल्डर एक हो
.....जी हां बीजेपी और लेफ्ट.........ये सवाल चौकाता जरुर है लेकिन, क्या जरुरी है महंगाई, गरीबी, भूख से आत्महत्या, हमारे बाजार पर विदेशी आधिपत्य आदि जैसे मसलों को हल करने के नाम पर  एक विचारधारा आड़े आए। जी हां जब यूपीए वन सरकार की विचारधारा को लेफ्ट नियंत्रित कर सकती है तो बीजेपी या एडनीए को क्यों नही ? बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विरोधी कुछ भी कहें लेकिन नीतीश कुमार ने पिछले सात सालों में बीजेपी के साथ सरकार चलाकर कम से कम एक सफल प्रयोग तो किया ही है, और लेफ्ट पार्टियां इसका लाभ उठा सकती है।

मौजूदा यूपीए सरकार जिस बेरहमी से महंगाई बढ़ा रही है और गरीबों के लिए स्लो प्वाइजन की स्थिति पैदा कर रही है, अपने बाजार को बंधक रख रही है.....उससे तो अच्छा है कि बीजेपी और लेफ्ट एक हो। क्योंकि मौजूदा सियासी सूरतेहाल में अब कोई नही पूछता राम मंदिर को.....मुसलमानों को लेकर बीजेपी की भूमिका में भी जबरदस्त तब्दीली आई है.....जब हम रहेंगे ही नही तो क्या हिन्दू क्या मुसलिम.....और क्या मन्दिर  और क्या मस्जिद.....फिलहाल जीना जरुरी है और ये सरकार जीने नही दे रही..... ये सरकार लगता है एसी कल्चर वालों की सरकार हो कर रह गयी है जो गरीबों की नही सोचती....इसके नेता और मंत्री एसी में रहते है एसी में सोचते है। यहां पर जमीन पर रह कर जमीनी लोगों को के बारे में सोचने वाले लेफ्ट नेताओं को ज्यादा सोचने की जरुरत है। असली लोकतंत्र वो है जो किसी भी किमत पर अपनी जनता को जिन्दा रखे। यूपीए सरकार के शासनकाल में इंसान की किमत घट रही है पैसे की दिन दुनी बढ़ रही है।टफपपके




तेलंगाना: बीजेपी के कब्जे वाली इकलौती लोकसभा सीट भी जा सकती है हाथ से

BJP MP Bandaru Dattatreya आंध्रप्रदेश से अलग होने के बाद वर्तमान में तेलंगाना के पास लोकसभा की 17 और विधान सभा की 119 सीटें रह गयी ह...