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Sunday, April 15, 2007

शर्म करो मंदिरा !

शर्म करो मंदिरा !
माना कि आप एक माडल पृष्ठभूमि से सम्बन्ध रखती है और आपका मूल पेशा भी वही है लेकिन किसी की धार्मिक भावनाओं से खेलना आप को शोभा नही देता। ख़ासकर उस आदमी से जो ख़ुद पंजाब की ज़मी से ताल्लुक रखता हो। आपकी तस्वीर देखने से पहले मै सिख कट्टरपंथियों को कोस रहा था, लेकिन आपकी इस तस्वीर को देख कर मुझे अपने आप पे खीज आ गयी। इसके दो कारण है एक तो नाहक ही बिना सच जाने प्रतिक्रिया देने चला था और दुसरा कि अब लोगों को ये बताते हुए भी शर्म आएगी कि मै आपका फैन था।
अब तो ज्यादा कुछ कहने की जरुरत ही नही है क्योंकि आपकी तस्वीर ही सब कुछ खुद ब खुद बयां कर रही है।

"जेलों में जंग"


दिल्ली और उत्तरप्रदेश की जेलों की हालत पर क्या कहा जाए, आए दिन कुछ ना कुछ घटनाएं सुनने को मिल ही जाती हैं। गाजियाबाद के डासना जिला कारागार में शनिवार को कैदीयों ने घंटों जमकर उत्पात मचाया। स्थिति पर काबू करने के लिए पुलिस व जेल स्टाफ को कई राउंड गोलियां चलानी पड़ी और आंसू गैस के गोले भी दागने पड़े। इसमें एक दर्जन पुलिसवाले व जेलकर्मी तथा करीब अस्सी बंदी घायल भी हुए। जिलाधिकारी व पीएसी के पहुंचने के बाद ही जेल में पुलिस बल प्रवेश कर सका। अभी कुछ ही दिनों पहले मेरठ जेल का निरीक्षण करने पहुंचे डीआईजी (जेल) एमएल प्रकाश की टीम को कैदियों ने जमकर धुना था। इस मामले में जेल प्रशासन की मिलीभगत होने की आशंका जतायी गयी थी। जेल की छापामारी में मोबाइल फोन व अन्य आपत्तिजनक वस्तुएं मिली थी। इस मामले की जांच एसडीएम को सौंपी गयी । दरअसल कुछ दिनों पूर्व भी वरिष्ठ अफसरों ने शिकायतें मिलने पर मेरठ जेल में छापामारी की थी। उस समय भी छापामारी के दौरान जेल में मोबाइल फोन और सिम कार्ड मिले थे। अभी कुछ ही दिन पूर्व तिहाड़ जेल के 12 विचाराधीन कैदी उस समय फरार हो गए, जब उन्हें एक विशेष अदालत में पेश करने के लिए ले जाया जा रहा था। जेलों में इस तरह बढ़ रही घटनाओं को देखकर क्या ये नही लगता कि अब वो समय आ गया है कि इस पर कोई ठोस कदम उठाया जाए? जिससे इस तरह की घटनाओं पर नकेल कसी जा सके।

"उमा की उलझन"






उमा भारती ने उत्तर प्रदेश चुनावों के बीच जिस तरह अचानक अपने प्रत्याशियों को वापस लेने की घोषणा से यह समझना कठिन हो गया है कि उनकी राजनीति किस तरह की राजनीति कर रहीं है? भाजपा से अलग होकर भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन करने वाली उमा भारती ने उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा के पक्ष में अपने प्रत्याशी हटाने की घोषणा करने के साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वह फिर से अपने मूल दल में शामिल नहीं होंगी, लेकिन उन्होंने अपने इस निर्णय के पीछे संघ परिवार के दबाव और अनुरोध का उल्लेख जरूर किया। ऐसा लगता है कि उमा भारती भाजपा से अलग होने के बाद यह तय नहीं कर पा रही है कि उन्हे अपनी राजनीति को किस तरह आगे बढ़ाना है? यही कारण है कि उनके भाजपा में लौटने की खबरे रह-रहकर आती ही रहती है। हालांकि ऐसी खबरों का वह खंडन करती रही है, लेकिन भाजपा के अनेक नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण देने का कोई मौका नहीं छोड़तीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हे इस बात का अहसास हो गया है कि वह अपने बलबूते एक सक्षम राजनीतिक शक्ति के रूप में नहीं उभर सकतीं? उत्तर प्रदेश चुनाव में अपने प्रत्याशी हटाने की उमा भारती ने जो घोषणा की उससे उनके समर्थकों का भ्रमित होना स्वाभाविक ही है। जब इस फैसले के बाद मदनलाल खुराना जैसे नेता उनसे दूर हो रहे है तब यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि अन्य समर्थक उनके साथ बने रहेगे? यदि उमा भारती इसी तरह एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाली राजनीति करती रहेगी तो इससे उनकी विश्वसनीयता को ही क्षति पहुंचेगी। उमा भारती के अनुसार उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में हिंदुत्व आधारित ताकतों को एकजुट करने के लिए अपने प्रत्याशी हटाए। यदि उनके इस निर्णय के पीछे वास्तव में यही कारण है तो फिर वह भविष्य में होने वाले चुनावों में किस आधार पर अपने प्रत्याशी उतार सकेंगी? आखिर ऐसा तो है नहीं कि चुनावों में हिंदू मतों के विभाजित होने का खतरा वह अकेले उत्तर प्रदेश में महसूस कर रही हों। जो भी हो, उमा भारती के इस निर्णय से उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों पर शायद ही कोई असर पड़े। उमा जी अब तो अपना लाईन लेन्थ ठीक कर लिजिए।

तेलंगाना: बीजेपी के कब्जे वाली इकलौती लोकसभा सीट भी जा सकती है हाथ से

BJP MP Bandaru Dattatreya आंध्रप्रदेश से अलग होने के बाद वर्तमान में तेलंगाना के पास लोकसभा की 17 और विधान सभा की 119 सीटें रह गयी ह...