
उमा भारती ने उत्तर प्रदेश चुनावों के बीच जिस तरह अचानक अपने प्रत्याशियों को वापस लेने की घोषणा से यह समझना कठिन हो गया है कि उनकी राजनीति किस तरह की राजनीति कर रहीं है? भाजपा से अलग होकर भारतीय जनशक्ति पार्टी का गठन करने वाली उमा भारती ने उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा के पक्ष में अपने प्रत्याशी हटाने की घोषणा करने के साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वह फिर से अपने मूल दल में शामिल नहीं होंगी, लेकिन उन्होंने अपने इस निर्णय के पीछे संघ परिवार के दबाव और अनुरोध का उल्लेख जरूर किया। ऐसा लगता है कि उमा भारती भाजपा से अलग होने के बाद यह तय नहीं कर पा रही है कि उन्हे अपनी राजनीति को किस तरह आगे बढ़ाना है? यही कारण है कि उनके भाजपा में लौटने की खबरे रह-रहकर आती ही रहती है। हालांकि ऐसी खबरों का वह खंडन करती रही है, लेकिन भाजपा के अनेक नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण देने का कोई मौका नहीं छोड़तीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हे इस बात का अहसास हो गया है कि वह अपने बलबूते एक सक्षम राजनीतिक शक्ति के रूप में नहीं उभर सकतीं? उत्तर प्रदेश चुनाव में अपने प्रत्याशी हटाने की उमा भारती ने जो घोषणा की उससे उनके समर्थकों का भ्रमित होना स्वाभाविक ही है। जब इस फैसले के बाद मदनलाल खुराना जैसे नेता उनसे दूर हो रहे है तब यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि अन्य समर्थक उनके साथ बने रहेगे? यदि उमा भारती इसी तरह एक कदम आगे और दो कदम पीछे वाली राजनीति करती रहेगी तो इससे उनकी विश्वसनीयता को ही क्षति पहुंचेगी। उमा भारती के अनुसार उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में हिंदुत्व आधारित ताकतों को एकजुट करने के लिए अपने प्रत्याशी हटाए। यदि उनके इस निर्णय के पीछे वास्तव में यही कारण है तो फिर वह भविष्य में होने वाले चुनावों में किस आधार पर अपने प्रत्याशी उतार सकेंगी? आखिर ऐसा तो है नहीं कि चुनावों में हिंदू मतों के विभाजित होने का खतरा वह अकेले उत्तर प्रदेश में महसूस कर रही हों। जो भी हो, उमा भारती के इस निर्णय से उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों पर शायद ही कोई असर पड़े। उमा जी अब तो अपना लाईन लेन्थ ठीक कर लिजिए।

No comments:
Post a Comment