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Monday, March 25, 2019

तेलंगाना: बीजेपी के कब्जे वाली इकलौती लोकसभा सीट भी जा सकती है हाथ से

BJP MP Bandaru Dattatreya
आंध्रप्रदेश से अलग होने के बाद वर्तमान में तेलंगाना के पास लोकसभा की 17 और विधान सभा की 119 सीटें रह गयी है। 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के बावजूद आए प्रचंड़ बहुमत में भी बीजेपी को तेलंगाना से लोकसभा में महज 1 ही सीट हासिल हुई थी। विधानसभा चुनाव उस वक्त साथ ही हुए थे और उसमें बीजेपी को 5 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। तेलंगाना बीजेपी से चौथी बार एकमात्र सांसद बने बंडारू दत्तात्रेय को कंद्रीय मंत्री के रुप में जगह मिली थी, लेकिन बाद में उन्हें भी फेरबदल में मंत्री पद गवाना पड़ा। मौजूदा समय में केंद्र सरकार में तेंलंगाना का कोई प्रतिनिधित्व दिखाई नही देता।
Bandaru Dattatreya , BJP (Left) & Anjan Kumar Yadev (Congress)

बीजेपी के कब्जे वाली जिस इकलौती लोकसभा सीट की हम बात कर रहें है वो है सिकंदराबाद लोकसभा सीट। इस लोकसभा क्षेत्र की ज़द में सात विधानसभा की सीटें शुमार होती हैं। अभी तक इस सीट पर सीधी टक्कर कांग्रेस और बीजेपी के बीच होती रही है। वक्त से पहले ही विधानसभा भंग कर दिसम्बर 18 के एसेंबली चुनावों में इन 7 सीटों मे से 6 पर सत्ताधारी टीआरएस ने जीत का परचम लहराया। 1 सीट पर AIMIM ने जीत दर्ज की, यानि एक तरह से कह सकते है कि पूरे पर सत्ताधारी दल का कब्जा (क्योंकि AIMIM टीआरएस के साथ है।) अगर पूरे राज्य की बात करें तो टीआरएस ने 119 में से 89 सीटें जीत कर प्रचंड़ बहुमत के साथ वापसी की थी। जहां असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने 7 सीटें जीतकर अपना पुराना रिकार्ड बरकरार रखा वहीं बीजेपी 5 से सिमट कर एक सीट पर आ गयी। कांग्रेस भी 20 सीटों से सिमटकर 19 हो गयी है। ये महज़ तीन महिनें पहले की बात है। रोचक बात ये कि इसी महिनें हुए विधान परिषद चुनावों के दौरान कांग्रेस के 19 विधायकों में से 6 सीएम केसीआर से मिलकर टीआएएस में शामिल होने का एलान कर चुके हैं, और कुछ कतार में है। यहां आपको ये भी बताते चले कि इन 5 सीटों में से 4 टीआरएस और एक AIMIM नें जीतीं है।

हम लौटते है अपने विषय सिंदराबाद लोकसभा सीट पर, महज़ कुछ महिने पहले हुए विधानसभा चुनावों और इसी महिने हुए विधानपरिषद चुनाव के परिणाम लोकसभा के भावी चुनावी परिणामों की तरफ खुद ब खुद इशारा कर रहें हैं। सिकंदाराबाद लोकसभा की 7 विधानसभा सीटों में से 6 पर टीआरएस का ताजा ताजा कब्जा स्पष्ट तौर पर टीआरएस के हक़ में इशारा करता है। सूबे में बीजेपी और कांग्रेस की लगातार कमजोर होती स्थिति भी इस बात पर मुहर लगाती है कि टीआरएस का टेम्पो हाई है। एक और महत्पू्र्ण बात, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी अपनी कई जनसभाओं से बीजेपी को ये खुली चुनौती दे चुके कि इकलौती सिकंदराबाद सीट भी बीजेपी से इस बार छीन ली जाएगी। बंडारू दत्तात्रेय को केंद्रीय मंत्री पद से हटाये जाने के बाद, विरोधी दल तेलंगाना के इकलौते प्रतिनिधित्व के अपमान का मुद्दा उठा सकते हैं। OBC  बाहुल्य वाले इस लोकसभा क्षेत्र में एक बयोवृद्ध OBC नेता का टिकट काटना भी बीजेपी को अंदर और बाहर दोनों तरह से नुकसान पहुंचा सकता है।
Bandaru Dattatreya (left) & Kishan Reddy, BJP (Right)

दूसरी तरफ, इस सकारात्मक माहौल के बावजूद टीआरएस के लिेए ये जीत आसान नही होगी। भले ही बीजेपी ने अपने मौजूदा सांसद बंडारू दत्तात्रेय का टिकट काट दिया है, लेकिन पूर्व तेलंगाना बीजेपी अध्यक्ष और लगाकतार तीन बार से विधायक रहें किशन रेड्डी को मैदान में उतारा है। किशन रेड़्डी सिंकदराबाद लोकसभा क्षेत्र में जमीनी स्तर पर दशकों से सक्रिय रहें हैं। इसी क्षेत्र की हिमायतनगर विधानसभा सीट की 2004 की जीत और अम्बरपेट विधानसभा सीट की 2009 से लगातार दो जीत इस बात की तस्दीक भी करती है। हलांकि किशन रेड़्डी विगत 2018 में अम्बरपेट विधानसभा सीट पर तीसरी जीत दर्ज नही करा सके। ये हार किशन रेड्डी के लिए भी अप्रत्यशित थी, क्योकि इनके विरोधी भी इनकी जीत को लेकर आश्वस्त थे। इस लोकसभा चुनाव में मोदी का साथ और पिछली हार की सहानुभूति किशन रेड्डी के काम जरुर आएगी। यहां हम आपको बता दें कि किशन रेड्डी प्रधानमंत्री मोदी के अच्छे मित्रों में शुमार होतें है, और मोदी कम से कम एक चुनावी रैली तो सिकंदराबाद में जरुर करेंगे, और उसका असर भी होगा। पिछले लोकसभा चुनावों में भी सिर्फ सिकंदराबाद सीट ऐसी थी जहां कुछ हद तक मोदी का जादू चला था।
Anjan Kumar Yadev (Congress)

सिकंदराबाद लोकसभा सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार है अंजन कुमार यादव, ये इसी लोकसभा सीट से दो बार सासंद रह चुके है। अंजन कुमार यादव सिंकदराबाद क्षेत्र के प्रभावशाली नेता माने जाते है। इस इलाके में यादव मतदाताओं की तादात ज्यादा होना भी पार्टी के भीतर इनकी दावेदारी को मजबूत करता है। चौदहवीं और पंद्रहवीं लोकसभा की लगातार जीत ने इनकी दावेदारी और इलाके में प्रभाव पर मुहर भी लगा दी। लेकिन 2014 में सोलहवीं लोकसभा के लिेए हुए चुनावों में ये बीजेपी के बंडारू दत्तात्रेय से शिकस्त खा बैठे।
Anil  Yadev, Youth Congress
 (Son og Anjan Kumar yadev)
अंजन कुमार यादव के बेटे अनिल कुमार यादव तेलंगाना यूथ कंग्रेस के अध्यक्ष है और क्षेत्र में युवाओं को प्रभावित करने का माद्दा रखते है, हंलाकि पिछले विधानसभा चुनावों में युवाओं का रुझान सीएम केसीआर के बेटे और युवा नेता के.टी. रामाराव (केटीआर) की तरफ तेजी से शिफ्ट हुआ है। विगत विधानसभा चुनावों में केटीआर ने विशेष तौर पर हैदराबाद में अपनी मेहनत से युवाओं को अपनी तरफ खींचा है। इसके बावजूद ये कहा जा सकता है कि नीजी तौर पर अंजन आज भी सिंकदराबाद के कद्दावर नेताओं में शुमार होते हैं।



Sai Kiran Yadev (TRS Candidate) 
आखिर में बात कर लेतें है, बिल्कुल नये, बिल्कुल युवा टीआरएस उम्मीदवार तलासनी सांई किरण यादव की। विधानसभा चुनावों में अपनी जीत से उत्साहित सत्ताधारी टीआरएस ने 32 साल के एक युवा चेहरे को मैदान में उतारा है। युवा तलासनी सांई किरण यादव पहली बार चुनावी राजनीति में कदम रख रहें है, हलांकि हैदराबाद के लोकल बॉडी (GHMC) और विधानसभा चुनावों में केटीआर की युवा फौज का हिस्सा रहें है। सांई सूबे के फिसरीज़ और सिनेमेटोग्राफी मंत्री और सनत नगर के विधायक तलासनी श्रीनिवास यादव के बेटे है। तलासनी सांई अपने पिता के चुनावी अभियान की भी जिम्मेदारियां सम्भाल चुके हैं, इस लिहाज से चुनावी राजनीति से नावाकिफ़ भी नहीं है।

एक तथ्य जो ध्यान देने लायक है और जूनियर तलासनी को मजबूत करता दिख रहा है, वो है, सिकंदराबाद के लोकल बॉ़डी में कांग्रेस और बीजेपी की गैर मौजूदगी। इस लोकसभा क्षेत्र में कुल 40 कॉरपोरेटर हैं, जिसमें से 31 टीआरएस के और 9 AIMIM के हैं। दावेदारी के तुरंत बाद मंत्री तलासनी यादव और जूनियर तलासनी सीधा AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी से मिलने पहुंचे।
Asaduddin Owasi, AIMIM (Left), Minister Talasani Srinivas Yadev (Center)
 & Sai Kiran (Right)
सदुद्दीन ओवैसी ने सिंकदराबाद से टीआरएस को सपोर्ट करने का ऐलान कर डाला, वैसे भी असदुद्दीन ओवैसी बीजेपी और कांग्रेस से इस सीट को छीनने की बात कर चुके है। ऐसी सूरतेहाल में सांई किरन की जीत का आधार मजबूत होता दिख रहा है। एक बात और जो काफी अहम है, वो ये कि सिंकदराबाद सीट पढ़े लिखे और जागरुक वोटरों के लिए जानी जाती है। और सांई किरण यादव इस पैमाने पर भी खरा उतरते हैं, सांई किरण यादव ने उच्च शिक्षा विदेशों में रह कर ली है, ठीक टीआरएस वर्किंग प्रेसिडेंट के. टी. रामाराव की तरह। हां, अंजन कुमार यादव की वज़ह से यादव वोटरों का विभाजन जरुर सांई किरण यादव को झेलना होगा।

इस पूरे विश्लेषण और तथ्यों के आलोक में ये आंदाजा लगाना मुश्किल नही कि टीआरएस, बीजेपी और कांग्रेस से ये सीट छीन सकती है। इस बात का अंदाजा टीआरएस उम्मीदवार तलासनी सांई किरण यादव को भी है। हमारे संस्थान (ANI) को दिये एक इंटव्यू में तलासनी सांई किरण यादव ने बड़े ही बेबाकी से इसे स्वीकार भी किया है।......
Talasni Sai Kiran Yadev with ANI 

ये जीत तो मुझे मेरे नेता केसीआर साहब और वर्किंग प्रेसिड़ेट की तरफ से थाली में सजा कर दी जा रहीं है, मुझे तो मेहनत सिर्फ जीत की मार्जिन के लिेए करना है।
                 --तलासनी सांई किरण यादव, टीआरएस उम्मीदवार, सिकंदराबाद लोकसभा क्षेत्र

Tuesday, March 12, 2019

तेलंगाना MLC चुनाव: कांग्रेस कुनबे में हुई सेंधमारी, चुनाव का किया बहिष्कार, सत्तापक्ष की जीत तय


तेंलागना विधानसभा चुनावों के बाद, और लोकसभा चुनावों के ठीक पहले विधान परिषद की 5 सीटों के लिए होने वाला ये चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्व है। महत्वपूर्ण इसलिए भी कि लोकसभा चुनावों से पहले टीआरएस के शक्ति परिक्षण के लिए ये अंतिम मौका है। लेकिन मतदान और परिणामों से पहले ही टीआरएस ने रणनीतिक सूझबूझ से अपनी जीत सुनिश्चित कर ली है। विधानसभा चुनावों से पहले बनी महाकुटुमी अपने छोटे से कुनबे को भी नही सहेज पायी। चार कांग्रेसी विधायक और एक टीडीपी विधायक सत्तारूढ़ टीआरएस में शामिल हो गये। इस शिकायत को लेकर कांग्रेस नेताओं ने राज्यपाल और चुनाव आयोग तक का दरवाजा खटखटाया है। कांग्रेस का आरोप है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव उनके विधायकों को प्रलोभन देकर लगातार टीआरएस में शामिल कर रहें है। तेलंगाना कांग्रेस अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी ने सत्तारूढ़ टीआरएस पर संविधान का उल्लंघन करने का आरोप लगाते हुए चुनावों का बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया है।


विधान परिषद के इन चुनावों में टीआरएस ने 4 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इन चार उम्मीदवारों में मंत्री मोहम्मद महमूद अली, एस सुभाष रेड्डी, सत्यवती राठौड़ और येग्गी मल्लेशम शामिल है। जबकि एक सीट गठबंधन सहयोगी एआईएमआईएम के लिए छोड़ दी है। एआईएमआईएम के सुप्रीमों असदुद्दीन ओवैसी ने मिर्जा रियाज उल हसन अफंदी को उम्मीदवार बनाया है। जबकि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने जी नारायण रेड्डी को अपना उम्मीदवार घोषित किया था।



120 सदस्यों वाली तेलंगाना विधानसभा में टीआरएस के 88 विधायक है। जबकि एक निर्दलीय विधायक और एक एआईएफबी के विधायक ने टीआरएस को समर्थन देने की घोषणा कर दी है। इसके चलते टीआरएस के सदस्यों की संख्य बढ़कर 90 हो गई है। सदन में एआईएमआईएम के सात विधायक है। बीजेपी का सदन में मात्र एक ही सदस्य है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के 19 विधायक है। मगर को इनके चार विधायक रेगा कांताराव, अतरम सक्कू, और चिरूमर्ती लिंगय्या, हरि प्रिया नायक हाल ही में टीआरएस में शामिल हे चुके है। वहीं टीडीपी के इकलौते विधायक एस. वेंकट विरैया भी टीआरएस में शामिल हो चुके हैं। ऐसी सियासी सूरतेहाल में कांग्रेस को उम्मीद की कोई किरण दिखती नज़र नही आ रही। लिहाजा चुनावों से दूर रहने का फैसला कर लिया है। चुनाव परिणामों से पहले ही परिणाम साफ है....टीआरएस 4 सीटों पर और एआईएमआईएम एक।

Tuesday, July 17, 2018

आखिरकार मिला शरत कोप्पू को न्याय, आरोपी को कंसास पुलिस ने एनकाउंटर में किया ढेर

अमेरिका के कंसास में भारतीय मूल के इंजीनियर शरत कोप्पू की गोली मारकर हत्या करनेवाले संदिग्ध आरोपी को कंसास पुलिस ने एक एनकाउंटर में मार गिराया। कंसास पुलिस के साथ हुई इस गोलीबारी में तीन पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं।

6 जुलाई को हैदराबाद के रहने वाले 25 वर्षीय शरद कोप्पू को लूटपाट के दौरान गोली मार दी गई थी, जिससे उनकी मौत हो गई थी। शरत को पीठ पर गोली मारी गयी थी और अस्पताल ले जाने के दौरान शरत ने दम तोड़ दिया। शरत भारत में वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर की पढाई करने के बाद अमेरिका में मास्टर्स की पढ़ाई करने गया था और एक रेस्तरां में पार्ट टाईम काम करता था।


आज जब दो अंडरकवर पुलिसवाले जब संदिग्ध से बात करने की कोशिश की तो वो पुलिस पर गोलियां चलाने लगा, उसकी तरफ से पुलिस पर कई राउंड फायरिंग की गई। इसीदौरान एनकाउंटर में संदिग्‍ध व्‍यक्ति मारा गया।


इस घटना की जानकारी के बाद शरत के चाचा प्रसाद कोप्पू ने फोन पर कहा कि "हालांकि यह एक ख़ुशी खबर है कि उसे सजा मिल गयी, लेकिन उसे पकड़ा जाना चाहिए और एक निर्दोष मारे जाने के लिए दर्द का एहसास करने के लिए सजा दी जानी चाहिए।"

Sunday, January 5, 2014

आखिरकार “खालिश सियासी शख्स” बन गये मनमोहन

नौकराशाह, अर्थशास्त्री और भारत के प्रधानमंत्री जैसे ओहदो पर रहने के बावजूद यूपीए सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह की “खालिश सियासी शख्स” की छवि नही बन पाई....विपक्ष और सत्ता के गलियारों को तो छोड़ दीजिए गली मुहल्लों चौक चौराहों पर होने वाली आम आदमी की चर्चा, बहस और मुबाहिसो में भी मनमोहन सिंह एक “विशेष छवि” से बाहर नही निकल पाये। लेकिन 10 साल तक हिन्दुस्तान की सत्ता पर काबिज रहने के बावजूद “खालिश सियासी शख्स” की छवि नही बन पाई उनकी। लेकिन कल अपनी प्रेस कांफ्रेन्स में मनमोहन सिंह ने नरेन्द्र मोदी पर जिस तरीके से निशाना साधा वो चौकाने वाला था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ऐसे तेवर में कभी कोई नही सुना था। मनमोहन सिंह ने कहा कि अगर मोदी पीएम बनते है तो तो वो देश के लिए विनाशकारी होगा। इस मौके पर मुझे मुनव्वर राणा साहब का एक शेर याद आया.........

सियासी आदमी की शक्ल तो प्यारी निकलती है,
मगर जब मुंह खोलता है तो चिंगारी निकलती है।


आज मै कह सकता हूं.....अपने रिटायरमेंट से पहले मनमोहन सिंह “खालिश सियासी शख्स” हो गये है।

Wednesday, December 18, 2013

देवयानी खोब्रागड़े मामला - कहां है महिलावादी संगठन ?

भारतीय राजनयिक देवयानी खोब्रागड़े के साथ अमेरिका में हुए दुर्व्यवहार के कई दिन बीत चुके है। आखिरकार देश की हूकूमत ने हल्के और सस्ते अंदाज में ही सही कड़ी प्रतिक्रिया दी। लेकिन ताज्जुब की बात ये कि बात बात पर महिला मुद्दों को लेकर सड़को पर उतरने वाली तथाकथिक महिलावादी और उनके संगठन कहां है ? क्या वातानुकलित दफ्तर और चैनलों में बैठ कर तीखी बहस से उनको फुर्सत नही ? ऐसे तो हर रोज जस्टिस गांगुली को लेकर सड़को पर दिख जाती है। 

कल सोफिया हयात के मसले पर भी अरमान कोहली के खिलाफ प्रदर्शन देखने को मिले। पिछले दिनों तरुण तेजपाल को लेकर भी सड़कों पर ऐसी महिलावादी संगठनों का प्रदर्शन देखने को मिला। लेकिन देवयानी खोब्रागड़े के साथ अमेरिका में हुए दुर्व्यवहार पर यूएस एम्बेसी तो क्या देश के किसी हिस्सें में कोई खास विरोध प्रदर्शन देखने को नही मिला। मुझे माफ करियेगा....भारत में ऐसे कई महिलावादी एनजीओं (संगठन) है जिनकी अर्थव्यवस्था की नीव अमरीका में ही कही दिखती नजर आती है और इनके कर्ताधर्ता और संचालकों का वहां आना जाना होता है।.....इस बात का जिक्र करने का मेरा मकसद महज इतना है कि अमरीका में भी जाकर विरोध प्रदर्शन कर सकते है ये संगठन ( अभी तक किया नही है।) । 
लगता है इन संगठनों को इस मसले में टीआरपी नही दिखती। कम से कम विदेश मंत्रालय पर विरोध प्रदर्शन किया होता। महिला बिल को लेकर तो संसद के सामने जहां किसी को फटकने तक नही दिया जाता वहां तक पहुच गये थे महिलावादी संगठन। कम से कम विदेश मंत्री का तो घेराव कर दिया होता। यू एस एम्बेसी के बाहर ही नारे लगा दिये होते।

Tuesday, December 17, 2013

ये देश का अपमान है।

इंडियन डिप्लोमैट देवयानी खोबरागडे की गिरफ्तारी और कपड़े उतारकर तलाशी लेने के मसले पर अपने विदेश मंत्री ने बड़ा ही डिप्लोमेटिक रुख अख्तियार किया.....एक तो लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के विरोध स्वरुप यूएस कांग्रेस के प्रतिनिधियों से मिलने के इंकार के बाद खुद मिलने चले गये और दूसरी तरफ इस घटना को देश का अपमान करार दिया। अरे भाई इतना ही अपमानित हो तो मुलाकात की क्या जरुरत थी। आप भी विरोध स्वरुप मुलाकात नही करते। ऐसी अपमान की घटनाओं से भारत के कई आम और खास दो चार हो चुके है.....लेकिन सरकार रस्म अदायगी के सिवा कुछ नही करती। ये घटना अपने आप में बेहद शर्मनाक है क्योंकि इससे पहले इस तरह की जो भी घटनाएं होती थी तो वो सुरक्षा के नाम पर एयपोर्ट पर होती थी। लेकिन एक आर्थिक अपराध की आरोपी महिला राजनयिक के साथ ये कैसा सलूक ?....आखिर कपड़ा किस बात पर उतरवा कर तलाशी ली गयी ? हैरत करने वाली पहली बात ये की एक महिला के साथ ऐसा सलूक किया गया....दूसरी ये कि एक देश के राजनयिक के साथ ऐसा किया गया जिसे कुछ खास विशेषाधिकार प्राप्त होते है। कायदन तो राजनयिक की गिरफ्तारी ही नही होनी चाहिए थी....भारतीय दूतावास और भारत सरकार को भरोसे में लेकर कोई कार्रवाही की जानी चाहिए थी....लेकिन अमरीकी पुलिस ने ऐसा कत्तई नही किया....दूसरी धृष्टता ये कि उस महिला राजनयिक को हथकड़ी पहनाई गयी और तीसरी और सबसे शर्मनाक ये कि उनके कपड़े उतरवा कर तलाशी ली गयी। खुद को सभ्य कहने वाला अमरीकी समाज जहां महिला अधिकारों और मानवीय अधिकारों को लेकर लोग सचेत रहते है और थोड़ी थोड़ी ज्यादतियों पर आंदोलन पर उतारु हो जाते है वो आखिर खामोश क्यूं है। ताज्जुब की बात ये कि मामले की शुरुआत ही घरेलू नौकर के अधिकारों के हनन को लेकर थी....उस जांच में अमरिकी पुलिस ने एक महिला और सम्मनित देश की एक राजनयिक के ही अधिकारों और सम्मान का हनन कर दिया।.........एक भारतीय के अंदर इसे लेकर गुस्सा तो जरुर है लेकिन इस सरकार का क्या करें जिसमें ऐसे मोर्चो पर रीढ़ की हड्डी ही नही दिखती।
आज 16 दिसम्बर- दिल्ली गैंगरेप की बरसी थी, हमारे सक्षम मंत्रियो और नेताओं ने महिला अधिकारों और महिला सुरक्षा को लेकर लम्बी लम्बी झोड़ी...... देवयानी खोबरागडे के मसले पर डिप्लोमैटिक रुख अख्तियार करने वाले विदेश मंत्री सलमान खुर्शिद ने तो दामिनी पर एक नज्म भी लिख डाली है। लेकिन उनकी असल ड्यूटी पर उन्होने हिलाहवाली कर डाली........ये मामला महज डिप्लोमेसी का नही देश की इज्जत से भी जुड़ा है। देवयानी खोबरागडे के प्रति सलमान खुर्शिद साहब की जिम्मेदारी ज्यादा बनती है क्योंकि वो विदेश में भारतीय दूतावास की एक अधिकारी है। एक बेटी के साथ ऐसा सलूक होने पर एक पिता का जो रुख होता है वो रुख अख्तियार करना चाहिए था सलमान खुर्शिद साहब को लेकिन उन्होने ऐसा नही किया।

Saturday, September 21, 2013

सियासत की वेदी पर सेना का मनोबल

पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह का रेवाड़ी में नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा करना और सेना की तरफ से लगाये गये आरोप महज इस्तेफाक नही हो सकते। सेना की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने के वक्त से ही इस मसले पर सियासत की बू आती है। आएगी भी क्यूं नही, जनरल मोदी के सुर में सुर मिला कर सियासी जो हो गये, अगर नही हुए तो सियासी मान लिए गये है। तभी तो जनरल सिंह पर नये ताजा आरोपों के लगने के बाद से सियासी बयानबाजियों की बाढ़ सी गयी है।  जनरल वी के सिंह पर आरोप लगे है कि उन्होने सेना के गुप्त कोष का इस्तेमाल कर जम्मू-कश्मीर की उमर अब्दुल्ला सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की थी। ये आरोप मिलिट्री ऑपरेशन्स के डीजी लेफ़्टिनेंट जनरल विनोद की अध्यक्षता में गठित जांच दल दल ने लगाया है। जनरल वीके सिंह की गठित की गई विवादित मिलिट्री इंटेलिजेंस यूनिट- टेक्निकल सर्विसिस डिवीजन के क्रियाकलापों की जांच के बाद ये बातें लेफ़्टिनेंट जनरल विनोद ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज की है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि टेक्निकल सर्विसिस डिवीजन ने कथित तौर पर अवैध रूप से सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के फ़ोन टेप किए थे। हलांकि भारतीय सेना पर किसी तरह का शक करना लाजमी नही फिर भी भूतकाल में सेना पर सियासी हस्तक्षेप के अनुभव मजबूर कर ही देते है।

रेवाड़ी में बीजेपी के नये पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी के साथ मंच साझा करने से पहले कोई भी ये बात दावें के साथ नही कह सकता था कि जनरल वी के सिंह बीजेपी या बीजेपी की नीतियों को करीबी है। ज्यादा से ज्यादा उनको अन्ना हजारे के सहयोगी के तौर पर देखा जा रहा था। क्योंकि अन्ना हजारे सभी सियासी पार्टियों से एक समान दूरी बनाते हुए अपने आंदोलन को जारी रखे हुए है। सेवानिवृत्ति के बाद से ही जनरल वी के सिंह की अन्ना आंदोलन में सक्रियता साफ तौर पर देखी गयी, यूपीए सरकार की नाक में दम करने वाले हर उस अभियान में जनरल ने हिस्सा लिया जो सरकार के नीतियों के विरोध में था। केंद्र की यूपीए सरकार को इससे असहजता जरुर हो रही थी क्योंकि हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी जनरल ने रिटायरमेंट के बाद इतनी सक्रियता से किसी जन आंदोलन में हिस्सा नही लिया था। आजाद भारत में कोई जनरल रिटायरमेंट के बाद अपनी ही सरकार के सामने इतने मुखालफती तेवर में कभी सामने नही आया। ये सरकार के लिए वाकई असहज करने वाली स्थिति थी। लेकिन दूसरी तरफ यूपीए सरकार को इस बात का संतोष था कि जनरल की गतिविधियां पूर्णत गैर राजनीतिक थी। टीम अन्ना में टूट के बाद जनरल वी के सिंह गैर राजनीतिक सोच वाले अन्ना के साथ ही जुड़े रहे।
वो अरविन्द केजरीवाल के साथ वैकल्पिक राजनीति वाली योजना के साथ खुद को जोड़ने से इंकार करते रहे। अन्ना का अभियान मंद पड़ता गया लेकिन जनरल सिंह उनके साथ जुड़े रहें और देश भर में कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर अन्ना के आंदोलन को आगे बढ़ाने का प्रयास भी करते रहे।
देश के सेना प्रमुख रहते हुए जनरल वी के सिंह तब विवाद में आए जब उन के सर्विस रिकॉर्ड में उनकी दो जन्मतिथि पाई गई, पहली 10 मई 1950 और दूसरी 10 मई 1951,  सर्विस रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ सेनाध्यक्ष के मैट्रिक प्रमाणपत्र में उनकी जन्मतिथि 10 मई 1951 बताई गई थी। जबकि सेना में प्रवेश के लिए संघ लोक सेवा आयोग के फ़ॉर्म में उनकी जन्मतिथि 10 मई 1950 थी। इस मसले को लेकर वो सुप्रीम कोर्ट भी गये थे। उनके इस मसले को वर्तमान सेना प्रमुख जनरल विक्रम सिंह की नियुक्ति से भी जोड़ कर देखा गया। सेना के सूत्रों की माने तो जनरल वीके सिंह नही चाहते थे कि विक्रम सिंह सेना प्रमुख बने। यही वज़ह थी कि इतने सम्मानजनक ओहदे पर रहने के बावजूद उन्होने वो किया जो आज तक किसी सेना प्रमुख ने नही किया था। हिन्दुस्तान के इतिहास में ये पहली घटना थी।
अब वी के सिंह पर लगे आरोप पर एक बार फिर नये सिरे से सियासत शुरू हो गई है। कांग्रेस जहां इस मसले को संवेदनशील मान रही है वही बीजेपी को इसमें सियासी साजिश की बू आ रही है। जनरल वी के सिंह पर लगे आरोप से रक्षा विभाग और सेना में खलबली मची हुई है। रक्षा विशेषज्ञ इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण मान रहे है। उनका मानना है कि ऐसी कई जांच सेना में होती रहती है, देश की सुरक्षा और सेना के मनोबल के लिए उसे सार्वजनिक नही किया जाता। ऐसे मामलों पर राजनीति ठीक नहीं है क्योंकि इससे सेना के मनोबल पर असर पड़ता है।
जनरल वी के सिंह ने भी अपने तरीके से इन आरोपों का जवाब देना शुरु कर दिया है, जो सियासी कम खुलासे ज्यादें के रुप में सामने भी आ रहे है। दुसरी तरफ सरकारी और विपक्षी धड़ों से जो बयान  आ रहें है वो भी म्यान से निकली तलवारों के मानिन्द ही है। अख़बारों और न्यूज चैनलों में भी ये नुरा कुस्ती बज़ाफ्ता दिख भी रही है। लेकिन इन सबके बीच सेना की छवि तार तार होती दिख रही है। हिन्दुस्तान में सेना को बड़े ही आदर के साथ देखा जाता है। लेकिन सियासत वो हमाम है जिसमें सभी नंगे होते है, और जो नही होते वो कर दिये जाते है। अगर इसमें सेना भी शामिल होगी तो ये इसकी छवि के लिए शुभ संकेत नही है।


Wednesday, September 19, 2012

अपने सियासी हितो को छोड़ ममता का साथ दें।

खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और डीजल, रसोई गैस की किमतों में यूपीए सरकार द्वारा किया गये इजाफे के बाद ममता बैनर्जी के आंखे तरेरने और समर्थन वापसी की धमकी के बाद सियासी हलचल तेज हो गयी है। सभी दल अपनी सियासी सौदेबादी की संभावनाओं को टटोलना शुरु कर दिये है। यूपीए सरकार के इस मौजूदा संकट के आलोक में कुछ दल समर्थन के बदले अपने राजनैतिक हित साधने की जुगत में लग गये है। मिसाल के तौर पर पुराने सियासी सौदागर मुलायम सिंह को दोनों हाथ में लड्डू नज़र आ रहा है तो दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ये एलान किया है कि उनका समर्थन उसी को होगा जो बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाएगा। तीसरी तरफ बीएसपी खामोश है, लेकिन वो भी अपने हितों को थामें मुफीद वक्त का इंतजार कर रही है।.....ममता बैनर्जी ने जो रुख अख्तियार किया है उससे इत्तेफाक रखने से इतर ये सियासी दल अपने हितों को साधने में लगे हुए है। इस वक्त मोटे तौर पर बीजेपी और लेफ्ट को छोड़कर कोई ऐसा दल (बीजेडी, अकाली और अन्य की बात नही कर रहा) नही है जो यूपीए के इस निर्णय का असरदार ढंग से विरोध करे
......अगर आप संकट की स्थिति में अपने स्वार्थपरक शर्तों के साथ खड़े होते है तो आप कहां विरोध कर रहें है? मुलायम और नीतीश यही कर रहें है। अगर आप रिटेल में एफडीआई, डीजल और रसोई गैस की बढ़ी किमतों का विरोध कर रहे है और इस मुद्दे पर यूपीए अल्पमत में आती है तो आप उनकी मदद करेंगे ?.....य़े कैसा विरोध है? ऐ जनता के तथाकथित नुमाइंदों कुछ तो रहम करो...... यूपीए सरकार के लिए मौजूदा संकट लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक सबक के तौर पर सामने आया है। कायदे से यूपीए को सबक मिल जाना चाहिए......अपने सियासी हितों को जनता के हितों के सामने त्यागने में ही भलाई है नही तो जनता जब फैसले पर उतरेगी तो सियासी सूरतेहाल कुछ और होगा......चूकि जनता की बारी में अभी वक्त है तो यूपीए के मनमौजी के माफिक भी कुछ सियासी दल अपनी मनमर्जी कर सकते है। लेकिन ममता बैनर्जी ने जो राकजनैतिक इच्छाशक्ति दिखाई है...उसके साथ सभी सियासी दलों को खड़ा होने की जरुरत है क्योंकि अंतत: ये  जनता के हित में ही है।

Sunday, September 16, 2012

लेफ्ट और राईट – अब साथ जरुरी

खुद को आम आदमी की सरकार कहने वाली यूपीए सरकार लगता है सत्ता के मद में इतनी चूर हो चुकी है कि उसे आम अवाम की आह तक नही सुनाई देती। यूपीए वन से यूपीए टू तक आम आदमी लगातार महंगाई से जूझ रहा है.....लेकिन केंद्र की यूपीए सरकार को ये कोई मुद्दा नही लगता इसकी वज़ह है महंगाई के मुद्दे के बावजूद पिछली लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत, तभी तो आम आदमी की बात करने वाली कांग्रेस इतनी दुस्साहसी हो गयी है। जो अपनी दूसरी पारी में मदमस्त पागल हाथी की तरह बेतुके फैसले करती जा रही है। कांग्रेस के इन जन विरोधी फैसलों पर नकेल कसने वाला भी कोई नही है......पिछली यूपीए सरकार में तो कम से कम लेफ्ट पार्टियां हाथियों के झुंड में उस ऊंट की भूमिका निभाती थे जो जरुरत पड़ने पर पागल हाथियों के कान मरोड़ते है।....लेकिन लेफ्ट पार्टियों की वो भूमिका यूपीए वन में ही न्यूक्लियर डील के मसले पर अमर सिंह और मुलायम सिंह की सियासी सौदेबाजी की भेट चढ़ गयी। लोकसभा चुनाव हुए तो बीजेपी के महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दों के बावजूद कांग्रेस बेहतर स्थिति में आई......लेकिन यूपीए वन की वामपंथियों की भूमिका यूपीए टू में फिसल कर त्रिणमूल यानि ममता बैनर्जी के हाथों में आ गयी
......ममता ने कांग्रेस या यूं कहें कि यूपीए के जनविरोधी फैसलों पर वामपंथियों से भी कड़ा रुख अख्तियार किया और यूपीए को ऐसे मसलों पर नियंत्रित भी करती रहीं......लेकिन ममता दीदी ने जब से पश्चिम बंगाल की बागडोर सम्भाली है और राईटर्स विल्डिंग बैठना शुरु किया है तब से यूपीए के जनविरोधी फैसलों पर उनका विरोध महज रस्मअदायगी ही लगता है। यूपीए सरकार के दूसरे घटक दल, जो जनसरोकारो की बात करते है और बढ़ती महंगाई और यूपीए के महंगाई में इजाफा करने वाले फैसलों की मुखालफत करते दिखते है, उनका भी कमोवेश यही हाल है.....उनका विरोध अखबार और टेलीविजन पर तो दिखता है लेकिन उसका असर सरकारी तौर पर कही नही दिखता.....शायद उनका विरोध सियासी सहूलियत और सत्ता लोलुपता की उनकी निजी मजबूरियों के आगे दम तोड़ जाता है। दरअसल ये सरकार घोटालों के उस जादुई चिराग की तरह है जहां कब कौन सा घोटाला निकल जाए कोई नही कह सकता...ऐसे में किस घोटाले में किस सहयोगी दल का कितना शेयर होगा ये भी कहना जरा मुश्किल है। तो यूपीए नाम के हमाम में एक दूसरे की नंगई पर पर्दा डालना ही यूपीए गठबंधन सहयोगियों की फितरत सी हो गयी है। मुख्य विपक्ष यानि बीजेपी का विरोध तो सरकार के कान में जूं तक नही रेंग रहा है....उसकी वज़ह बहुत कुछ समूचे विपक्ष के एकजुट ना होने की वज़ह से भी है। इसमें सबसे प्रमुख भूमिका निभा रही है वो पार्टियां जो सियासी बहरुपियों के तौर पर सदन के भीतर अपनी पहचान कायम किये हुए है
.....जीं है समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आरजेडी और लोजपा जैसी पार्टियां ऐसी ही पार्टियों में शुमार है। ये सियासी बहरुपिये जनसरोकार के मसलों पर सदन के भीतर समूचे विपक्ष की एकता के नाम पर खड़े तो होते है लेकिन जब मामला क्लाइमेक्स पर पहुंचता है तो ये पिछले दरवाजे से लापता हो जाते है। इस सियासी बेर्शमी से सदन एक बार नही बल्कि कई बार दो चार भी हुआ है। ये पार्टीयां खुद को क्षेत्रिय तो कहती है लेकिन इनके सियासी सौदेबाजी में क्षेत्र हित कम और स्व हित ज्यादा होता है। कभी इन पर खुद को सीबीआई के चंगुल से बचने के नाम पर समझौता करने का आरोप लगता है तो कभी किसी जांच या सियासी जोडतोड़ की वज़ह से। कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि यही पार्टियां देश को एक तीसरा विकल्प देने की बात कर रही है। पैंतरे बदलने वाली ये सियासी ताकते सत्ता में आने के लिए लेफ्ट से दोस्ती गाठने के लिए तत्पर है लेकिन जनसरोकारों पर इनकी असल राजनैतिक इच्छाशक्ति हवा हो जाती है। कुल मिलाकर क्या आज जरुरत इस बात की नही कि जनसरोकार के मसले पर विपक्ष के बड़े स्टेक होल्डर एक हो
.....जी हां बीजेपी और लेफ्ट.........ये सवाल चौकाता जरुर है लेकिन, क्या जरुरी है महंगाई, गरीबी, भूख से आत्महत्या, हमारे बाजार पर विदेशी आधिपत्य आदि जैसे मसलों को हल करने के नाम पर  एक विचारधारा आड़े आए। जी हां जब यूपीए वन सरकार की विचारधारा को लेफ्ट नियंत्रित कर सकती है तो बीजेपी या एडनीए को क्यों नही ? बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विरोधी कुछ भी कहें लेकिन नीतीश कुमार ने पिछले सात सालों में बीजेपी के साथ सरकार चलाकर कम से कम एक सफल प्रयोग तो किया ही है, और लेफ्ट पार्टियां इसका लाभ उठा सकती है।

मौजूदा यूपीए सरकार जिस बेरहमी से महंगाई बढ़ा रही है और गरीबों के लिए स्लो प्वाइजन की स्थिति पैदा कर रही है, अपने बाजार को बंधक रख रही है.....उससे तो अच्छा है कि बीजेपी और लेफ्ट एक हो। क्योंकि मौजूदा सियासी सूरतेहाल में अब कोई नही पूछता राम मंदिर को.....मुसलमानों को लेकर बीजेपी की भूमिका में भी जबरदस्त तब्दीली आई है.....जब हम रहेंगे ही नही तो क्या हिन्दू क्या मुसलिम.....और क्या मन्दिर  और क्या मस्जिद.....फिलहाल जीना जरुरी है और ये सरकार जीने नही दे रही..... ये सरकार लगता है एसी कल्चर वालों की सरकार हो कर रह गयी है जो गरीबों की नही सोचती....इसके नेता और मंत्री एसी में रहते है एसी में सोचते है। यहां पर जमीन पर रह कर जमीनी लोगों को के बारे में सोचने वाले लेफ्ट नेताओं को ज्यादा सोचने की जरुरत है। असली लोकतंत्र वो है जो किसी भी किमत पर अपनी जनता को जिन्दा रखे। यूपीए सरकार के शासनकाल में इंसान की किमत घट रही है पैसे की दिन दुनी बढ़ रही है।टफपपके




तेलंगाना: बीजेपी के कब्जे वाली इकलौती लोकसभा सीट भी जा सकती है हाथ से

BJP MP Bandaru Dattatreya आंध्रप्रदेश से अलग होने के बाद वर्तमान में तेलंगाना के पास लोकसभा की 17 और विधान सभा की 119 सीटें रह गयी ह...