
सुन कर अच्छा लगा कि ब्रिटेन के स्कूलों में ब्रिटिश राज के इतिहास के अध्ययन के तहत 1919 में एक ब्रिटिश जनरल द्वारा अमृतसर के जलियांवाला बाग में सैकड़ों भारतीयों का कत्लेआम किये जाने की घटना के बारे में पढ़ाया जाएगा। ब्रिटिश अखबार, द टाइम्स ने यह खबर दी है कि द क्वालिफिकेशन्स एंड करिकुलम अथॉरिटी ने कहा है कि 11 से 14-वर्षीय छात्रों को ब्रिटेन और भारत के साझा इतिहास की जानकारी देने के लिए यह पाठ्यक्रम तैयार किया गया है। यह पाठ्यक्रम 15 घंटों की अवधि में पूरा किया जाएगा और इससे छात्रों को कत्लेआम की विभिन्न व्याख्याओं का आकलन करने में मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि भारत पर अंग्रेजों के शासन के दौरान ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में सभा कर रहे निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाने का हुक्म अपने सैनिकों को दिया था, जो ब्रिटिश राज पर सबसे बदनुमा दाग है। इस कत्लेआम के बाद पूरे भारत में राष्ट्रवादी भावनाएं भड़क उठी थीं और ब्रिटिश राज से पूर्ण स्वतंत्रता हासिल करने की मांग बढ़ने लगी थी।
अब तक शहीदों की सही संख्या की जानकारी भी नही है लोगों को
इस घटना के 87 साल बीत जाने के बाद भी आज तक शहीदों हुए लोगों के सही संख्या के बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी नही। इन शहीदों को अभी तक स्वतंत्रता सेनानी का भी दर्जा नही मिल पाया है। हंटर कमेटी की रिपोर्ट में मरने वालों की सख्या 200 से 300 के करीब बतयी गयी थी, जबकि पंजाब होम मिनिस्ट्री की रिपोर्टमें मरने वालों की संख्या 379 और घायलों की संख्या 1200 बतायी गयी थी। भारत सरकार कई इतिहासकारों के हस्तक्षेप के बावजूद अंग्रेजी आंकड़ों की ही मुरीद बनी है अब तक। सवाल ये है कि ब्रिटिश सरकार क्या अपने पाठ्यक्रमों में भी इन आंकड़ों का घाल-मेल करेगी?

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